गजानन जी की कहानी (Ganesh ji ki kahani) – गणेश जी की कहानी

माता पार्वती का विवाह भगवान शंकर से हो गया था। माता पार्वती के माता-पिता और सभी देवी-देवता इस विवाह से बहुत खुश थे। माता पार्वती अपने घर से विदा होकर कैलाश पर्वत पहुंची। अब माता पार्वती भोलेनाथ के साथ मिलकर गृहस्थी की जिम्मेदारियां संभालने लगी थी। ऐसे करते करते बहुत दिन बीत गए।

अब माता पार्वती को अकेलेपन का एहसास होने लगा था। इसी अकेलेपन के ही चलते उनके मन में ममता का भाव जग उठा था। फिर एक दिन कुछ अनोखा हुआ जो इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया। एक दिन माता पार्वती नहाने के लिए स्नानघर की ओर जाने लगी।

जब वह स्नानघर के पास पहुंची तो देखा कि उस जगह पर तो कोई रक्षक ही नहीं खड़ा था। क्योंकि माता पार्वती को एक रक्षक की जरूरत थी इसलिए उनके दिमाग में एक विचार आया। माता पार्वती ने अपने शरीर पर हल्दी और चंदन का उबटन लगाया।

उबटन लगाने के बाद माता पार्वती ने अपने शरीर की मैल उतारी और उसी मैल से एक सुंदर बालक को प्रकट कर दिया। वह बालक बहुत ही बहादुर लग रहा था। माता पार्वती ने उस बालक को कहा कि, “तुम मेरे पुत्र है। अब मैं नहाने जा रही हूं। तुम मेरी निजी सुरक्षा के हेतु मेरे स्नानघर के आगे खड़े होकर पहरा दो। अगर कोई भी यहां आने की कोशिश करे तो उन्हें आने की अनुमति मत देना।

अब माता पार्वती नहाने चली गई थी। माता पार्वती का पुत्र अपनी माता की सुरक्षा में तैनात था। कि तभी भगवान शिव वहां पर आए। उन्होंने हर जगह पर माता पार्वती को ढूँढा पर माता कहीं नहीं मिली। फिर भोलेनाथ स्नानघर के पास आए और माता पार्वती को पुकारने लगे। इस बात पर उस बालक ने उत्तर दिया कि माता पार्वती नहाने गई है।

जब भोलेनाथ स्नानघर की ओर जाने लगे तो उस बालक ने महादेव को रोक लिया। इस बात पर महादेव को गुस्सा आ गया। वह इतना ज्यादा क्रोधित हो गए कि उन्होंने उस बालक का सिर काट दिया। थोड़ी देर बाद जब माता पार्वती नहाकर बाहर आई तो वह बाहर का दृश्य देखकर कांप गई।

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बाहर माता पार्वती का पुत्र बिना सिर के जमीन पर मृत पड़ा था। यह सब देखकर माता पार्वती को भयंकर गुस्सा आ गया। वह महादेव जी से बोली कि, “महादेव आपने अपने पुत्र की हत्या कर दी।” अब भोलेनाथ बिखर गए कि उन्होंने अपने ही पुत्र का अंत कर दिया।

माता पार्वती के क्रोध से जब धरती पर प्रलय आना शुरू हो गया तब देवी देवताओं ने भोलेनाथ से आग्रह किया कि वह माता पार्वती को रोके। भोलेनाथ ने जब माता पार्वती को शांत होने के लिए कहा तो माता ने कहा कि वह तभी शांत होगी जब उनका पुत्र पुनः जीवित हो जाएगा।

तब भोलेनाथ ने कहा कि उनके पुत्र को जीवित करने का एक ही उपाय है कि उस बालक के सिर की जगह किसी जानवर का सिर लगाया जाए। फिर भगवान शिव के आदेश पर नंदी एक हाथी का सिर ले आए। और जैसे ही वह सिर उस बालक के सिर से जुड़ा वह बालक जीवित हो उठा। उस दिन के बाद उनका नाम गणपति रख दिया गया।

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