गौतम बुद्ध (कहानी 1) अछूत कौन?

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Ekta Ranga

हर बार की ही तरह गौतम बुद्ध के सभी शिष्य उनके आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। वह हर दिन की ही तरह गौतम बुद्ध से प्रवचन सुनना चाहते थे। सभी ने सोचा कि आज गौतम बुद्ध ने आने में देरी क्यों कर दी। कि तभी अचानक गौतम बुद्ध का सभा में प्रवेश हुआ। हर दिन की तरह आज गौतम बुद्ध के चेहरे पर प्रसन्नता का भाव नहीं था।

गौतम बुद्ध आए और बिना कोई शब्द बोले बरगद के पेड़ के नीचे बैठ गए। बैठते ही उन्होंने अपनी आंखें बंद कर ली और साधना करने लगे। तभी उनके एक शिष्य ने पूछा कि, “गुरुजी, क्या आज आप हमें प्रवचन नहीं सुनाएंगे?” बुद्ध ने जवाब नहीं दिया। फिर दूसरे शिष्य ने पूछा, “गुरुजी, आज आपको क्या हो गया है? आप हमसे बात क्यों नहीं कर रहे हैं?” बुद्ध तो अब भी शांत ही थे। किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। सभी ने सोचा कि बुद्ध को आखिर क्या हो गया है। बुद्ध बिना कुछ बोले अपनी साधना में लीन थे।

अचानक एक आदमी वहां पर हांफते हुए पहुंचा। इससे पहले कि वह बुद्ध तक पहुंच पाता, बुद्ध के शिष्यों ने उसे रोक लिया। शिष्यों के द्वारा रोके जाने पर वह आदमी जोर से चिल्लाया। वह बोला, “गुरुजी आप मुझे अंदर आने से रोक क्यों रहे हैं। मुझे अंदर आने की अनुमति क्यों नहीं मिल रही है।” एक शिष्य ने कहा, “हम तुम्हें गुरुजी की आज्ञा के बिना अंदर आने की अनुमति नहीं दे सकते हैं।” अब वह व्यक्ति और तेज चिल्लाने लगा। उसकी तेज आवाज के चलते बुद्ध को अपनी आंखें खोलनी ही पड़ी।

जैसे ही बुद्ध ने आंखें खोली उस आदमी ने अंदर आने की पूरी कोशिश की। लेकिन बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा, “इस इंसान को अंदर मत आने देना। यह आदमी अछूत है। और अछूत इंसानों को मैं अपनी धर्मसभा में आने की अनुमति नहीं देता।” सभी शिष्य बुद्ध की बात सुनकर हैरान रह गए। सभी शिष्यों ने सोचा कि गौतम बुद्ध कब से छूत-अछूत जैसी बातों पर विश्वास करने लगे।

इसी बात पर एक शिष्य ने बुद्ध के पास जाकर पूछा, “क्या हुआ गुरुजी? आप इस व्यक्ति को अंदर आने से क्यों मना कर रहे हैं। आपने तो कभी भी किसी की जात पात को लेकर कोई भेदभाव ही नहीं किया। तो फिर आज आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?” बुद्ध ने अपने शिष्य से कहा, “तुमनें एकदम सही कहा कि मैं छूआछूत जैसी बातों में विश्वास नहीं करता। पर यह व्यक्ति तो अछूत ही है।

“शिष्य ने कहा, “अगर इसकी जात अछूत नहीं है तो फिर यह अछूत कैसे हुआ, गुरुजी? मेरी उलझन को सुलझाओ, गुरुजी।” बुद्ध ने कहा, “तुम इसी से ही क्यों नहीं पूछते कि यह अछूत क्यों है?” फिर बुद्ध के शिष्य ने उस आदमी से पूछा कि उसके अछूत होने का कारण क्या है। लेकिन उस व्यक्ति ने जवाब ही नहीं दिया। फिर बुद्ध ने कहा, “यह व्यक्ति क्या जवाब देगा। इसने तो घोर पाप किया है।

दरअसल हुआ यूं कि मैं आज भिक्षा लेकर बाजार की ओर से आश्रम आ ही रहा था कि तभी मेरी नजर इस आदमी पर गई। यह आदमी अपनी पत्नी को भरी सभा में फटकार लगा रहा था। इसने अपनी को ऐसे अपशब्द कहे कि मुझे कहने में भी शर्म आ रही है। यह मनुष्य कहलाने के भी लायक नहीं है।” अब सब जने उस व्यक्ति को क्रोध भरी नजरों से देख रहे थे। उस व्यक्ति की नज़रे शर्म के मारे झुक गई। वह पानी पानी हो गया।

फिर वह भागता हुआ गौतम बुद्ध के पास पहुंचा और बोला, “मुझे क्षमा कर दीजिए, गुरुजी। आज मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मैंने आज बहुत बड़ा पाप किया है।” बुद्ध बोले, “मैं तुम्हें माफ़ केवल एक शर्त पर कर सकता हूं। पहले तुम सभी के सामने यह प्रतिज्ञा लो कि तुम आगे से कभी भी अपनी पत्नी का अनादर नहीं करोगे।” वह बोला, “मैं प्रतिज्ञा लेता हूं कि मैं कभी भी अपनी पत्नी का अपमान नहीं करूंगा। मैं हमेशा उसका आदर करूंगा।” उसके ऐसा कहते ही बुद्ध ने उसे माफ़ कर दिया।

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