गौतम बुद्ध (कहानी-7) बुद्ध ने युवक को सत्संग का महत्व समझाया

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Ekta Ranga

बुद्ध हफ्ते में एक बार एक नए गाँव जाते और वहां जाकर लोगों को उपदेश दिया करते थे। सभी लोग बुद्ध के उपदेश देने के अंदाज से बहुत प्रभावित थे। जो कोई भी बुद्ध से प्रवचन सुनकर जाता वह सभी अपने जीवन के लक्ष्यों को पहचान लेते थे। बुद्ध की आवाज में मानो कोई जादू सा था कि सभी कोई मंत्रमुग्ध हो उठते थे। बुद्ध का व्यक्तित्व भी बहुत जादुई था। उनके व्यक्तित्व से ना जाने कितने ही लोग प्रेरित हो उठते थे। जो लोग गलत मार्ग पर जा रहे होते उन्हें भी बुद्ध अपने उपदेशों द्वारा सही मार्ग पर ले आते।

एक दिन ऐसे ही एक गाँव में बुद्ध उपदेश देने पहुंचे हुए थे। सुबह से ही उपदेश और सत्संग का दौर चल रहा था। उपदेश सुनने के लिए भक्तों की भारी भीड़ मौजूद थी। उन्हीं खूब सारे भक्तों में एक भक्त ऐसा भी था जो भीड़ कम होने का इंतजार कर रहा था।

फिर जैसे ही भीड़ कुछ कम हुई तो उसने सोचा कि यही सही समय है मन के प्रश्न को बुद्ध के समक्ष रखने का। वह बुद्ध के पास गया और बुद्ध के सामने अपना प्रश्न रखा, “गुरुजी, आप लगातार तीन दिनों से लगातार उपदेश दे रहे हो। तीन दिनों से मैं भी लगातार आपके उपदेश सुनने आ रहा हूं। पर फिर भी मेरे मन में एक उलझन है।

बुद्ध बोले, “बोलो, कुमार। तुम बेफिक्र होकर पूछो कि तुम्हारे मन में क्या उलझन चल रही है?” वह व्यक्ति बोला, “गुरुजी, आप जब भी उपदेश देते हो तो मेरा मन एकदम से प्रफुल्लित हो उठता है। मैं खुद को ऊर्जावान महसूस करता हूं। मेरे अंदर एक अलग ही प्रकार की सकारात्मक शक्ति आ उठती है।

लेकिन जैसे ही मैं अपने घर में प्रवेश होता हूँ तो ऐसा लगता है कि जैसे वह सकारात्मक ऊर्जा कहीं गायब हो गई है। मैं अपने घर पर रहकर ना जाने क्यों उन चीजों का पालन नहीं कर सकता जो मुझे करनी चाहिए। घर में प्रवेश करते ही ऐसा क्या बड़ा बदलाव आ जाता है कि आपके उपदेश वहां कोई काम नहीं करते।”

बुद्ध उसकी बात को ध्यानपूर्वक सुन रहे थे। उन्होंने दो मिनट के लिए इस बात पर सोचा फिर जवाब दिया, “वो बांस की टोकरी देख रहे हो। तुम उसे उठाओ और उसमें तालाब से पानी भरकर ले आओ। याद रहे कि उसमें से पानी नहीं गिरना चाहिए।” आदमी ने कहा, “ठीक है। मैं अभी उस टोकरी में पानी भर के ले आता हूं।

“वह व्यक्ति तालाब के पास गया और पानी भरके ले आया। पर जब तक वह बुद्ध के पास पहुंचा उस टोकरी से सारा पानी गिर चुका था। बुद्ध ने उसे प्यार से कहा, “कोई नहीं। तुम आज पानी लाने में असफल हुए पर यह मेरा वादा है कि आने वाले समय में तुम निश्चित ही इस टोकरी में पानी भर सकोगे।” वह आदमी अब हर रोज ऐसा करता पर सफल नहीं हो पाता था। एक दिन उस आदमी ने बुद्ध से कहा कि टोकरी में तो आज तक भी पानी भर नहीं पा रहा है।

बुद्ध ने कहा, “वत्स, तुम पहले अच्छे से देखो कि टोकरी को देखकर तुम्हें क्या फर्क़ नजर आ रहा है?” उस व्यक्ति ने टोकरी का अच्छे से निरीक्षण किया और कहा, “हाँ, इस टोकरी में यह फर्क़ देखा जा सकता है कि अब इस टोकरी में मिट्टी साफ़ देखी जा सकती है। यहां तक कि इस टोकरी के छेद जो पहले बड़े हुआ करते थे वह अब छोटे हो गए हैं।” बुद्ध ने कहा, “तुमनें एकदम सही कहा वत्स।

अब तुम देखना कि कैसे यह छेद थोड़े दिनों अपने आप ही इतने छोटे हो जाएंगे कि इस टोकरी में पानी अपने आप भरने लगेगा। ठीक इसी प्रकार हमारा मन होता है। अगर हम निरंतर भगवान के ध्यान में अपना सारा तन मन अर्पण कर दे, तो हमें जीवन की हर तरह की परेशानियां बहुत कम लगने लगेगी। ऐसा करने से धीरे-धीरे हमारे सारे अवगुण खत्म हो जाएंगे। बस हमें चाहिए कि हम निरंतर भगवान का सत्संग करते रहें। मन अपने आप शुद्ध होता चला जाएगा।” अब उस आदमी को सत्संग का असली महत्व समझ आ चुका था।

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