भूतों की कहानी-9 ”रहस्यमयी सड़क”

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Ekta Ranga

यह बहुत समय पहले की बात है। जहां तक मुझे याद है इस बात को करीब – करीब 12 साल बीत गए हैं। मेरे ताऊजी के साथ यह घटना उस समय घटित हुई थी। ताऊजी ने जब हम सभी को यह बात बताई तो हम बहुत ज्यादा डर गए थे। हालांकि ताऊजी भूत प्रेत जैसे किस्सों पर विश्वास नहीं करते थे। लेकिन उस दिन उस रहस्यमयी सड़क की वजह से उनको इस चीज पर थोड़ा सा विश्वास हो गया था।

इस दुनिया में अदृश्य शक्तियां होती है। हालांकि हम उनको देख नहीं सकते लेकिन फिर भी यह हर पल हमारे आस-पास मौजूद रहती है। इस प्रकार की शक्तियां या तो बुरी होती है या फिर अच्छी। ज्यादातर लोगों को यही लगता है कि यह सारी शक्तियां बुरी ही होती है। लेकिन ऐसा नहीं है। बहुत से ऐसे भी किस्से होते हैं जहां पर अदृश्य शक्ति किसी इंसान की मदद भी कर देती है। ऐसे किस्से हमें डराते तो हैं लेकिन दूसरे ही पल वह हमें एक प्रकार से अच्छाई का संदेश भी देते हैं। तो आइए मैं अब आपको उस पुराने दिन में ले चलती हूं जिस दिन मेरे ताऊजी के साथ कुछ अलग ही तरह की घटना घटी थी।

यह बात 2011 की है। मेरे ताऊजी गवर्नमेंट बैंक मैनेजर थे। इसी वजह के चलते उनका एक जगह से दूसरी जगह आना जाना लगा रहता था। हम सब जयपुर में रहते थे। उस समय उनकी पोस्टिंग उदयपुर के एक बैंक में हो रखी थी। क्योंकि तीन दिन बाद ही दिवाली थी इसलिए मेरे ताऊजी को इसी सिलसिले के चलते घर आना था।

हालांकि ताऊजी को इस साल बैंक की तरफ से ज्यादा काम मिला था इसलिए उनका घर आना असंभव सा लग रहा था। लेकिन ताऊजी कहां मानने वाले थे। ताऊजी ने यह तय कर रखा था कि वह दिवाली तो अपने घर पर ही मनाएंगे। इसलिए ताऊजी ने बैंक अधिकारी से बात की और दिवाली के हिसाब से पांच दिन की छुट्टियां ले ली।

ताऊजी के साथ उनके एक दोस्त कर्मचारी महेश ने भी बैंक से छुट्टी ले ली थी। क्योंकि दोनों का घर जयपुर में ही था इसलिए दोनों ने यह तय किया कि वह दोनों ही उदयपुर से कार लेकर जयपुर तक जाएंगे। वह दोनों उदयपुर से रवाना हो गए। छह घंटे का सफर आराम से कटे इसके लिए उन दोनों ने कार के स्पीकर पर गाने चला दिए।

कार की खिड़की भी खुली थी। मंद मंद हवा बह रही थी। एक घंटे बाद में मेरे ताऊजी को जोरों से भूख लगने लगी। उन्होंने महेश अंकल को कहा कि कोई अच्छे ढाबे पर रोक देना। तभी महेश अंकल ने देखा कि कार में पेट्रोल भी कम हो गया था। पर ताऊजी ने कहा कि पेट्रोल तो कल ही भरवाया था तो फिर यह कम कैसे हो गया? महेश अंकल को भी यह कुछ रहस्यमयी लगा। उन्होंने कहा कि अब पेट्रोल तो भरवाना ही पड़ेगा। पर पहले खाना खा लिया जाए।

वह दोनों कोई अच्छा ढाबा ढूंढने लगे। पर उनकी कार तो राष्ट्रीय हाइवे पर चल रही थी। उस हाइवे पर ढाबा तो दूर दूर तक नहीं दिख रहा था। अचानक ही उनकी नजर एक ढाबे पर पड़ी जो कि हाइवे पर नहीं था बल्कि एक हाइवे के किनारे पर जाती हुई पतली सी सड़क पर था। अब उन दोनों के पास कोई चारा ही नहीं बचा था। उन दोनों ने सोचा कि क्यों ना उसी ढाबे पर चला जाए।

फिर वह दोनों उस ढाबे पर पहुंचे। उन्होंने देखा कि ढाबे के आसपास सुनसान थी। केवल कुत्तों के भौंकने की आवाज और पेड़ के पत्तों की सरसराहट के अलावा वहां और किसी की भी आवाज नहीं आ रही थी। ढाबे पर उन्होंने देखा कि केवल दो आदमी ही मौजूद थे। एक आदमी युवा था। तो दूसरा आदमी अधेड़ था। दोनों ही आदमी महेश अंकल और ताऊजी को देखकर मुस्करा रहे थे।

क्योंकि ताऊजी को जोरों से भूख लगी थी इसलिए उन्होंने उस युवा आदमी को खाना बनाने का ऑर्डर दिया। उस आदमी ने खाना बनाया और जल्दी से उसे लाकर टेबल पर रख दिया। फिर ताऊजी और महेश अंकल ने खाने का आनंद उठाना शुरू कर दिया। ताऊजी ने उस लड़के से पूछा कि वह कहां रहता है? उसने कहा कि वह यही पास में ही अपने पापा के साथ रहता है। उसने उस बुजुर्ग व्यक्ति के सामने इशारा करते हुए बताया कि वह उसका पिता है।

उस बुजुर्ग व्यक्ति ने ताऊजी को कहा कि, “बेटा अभी बहुत ज्यादा रात हो गई है। इसलिए ऐसा करना कि तुम दोनों सुबह ही चले जाना। अभी रात को तुम दोनों का राष्ट्रीय मार्ग से निकलना सही नहीं रहेगा।” उस व्यक्ति ने इतनी गंभीरता से यह बात कही कि ताऊजी और महेश अंकल ने उनकी बात मान ली। लेकिन अब बात यह थी कि अब रात को रुका कहां जाए। उस बुजुर्ग व्यक्ति ने अपने बेटे से कहा कि वह हम दोनों को एक कमरा दे दे। उन दोनों को सोने के लिए एक कमरा दे दिया गया। वह कमरा उन ढाबा चलाने वाले बाप और बेटे का था।

अगले दिन ताऊजी और महेश अंकल सोकर उठे। उन्होंने घड़ी की ओर नजर घुमाई तो देखा कि घड़ी में सुबह के छह बजे थे। उन दोनों ने अपनी नज़रे उन बाप और बेटे को ढूंढने के लिए चारों ओर घुमाई। लेकिन वह दोनों कहीं भी नज़र नहीं आए। महेश अंकल ने कार की ओर रुख किया और कार का पेट्रोल खंगाला।

लेकिन यह क्या? उन्होंने देखा कि कार का पेट्रोल तो पूरा था। महेश अंकल अब थोड़ा सा घबरा गए थे। वह सोचने लगे कि कल जो कुछ भी उनके साथ हुआ क्या वह सपना था या हकीकत? फिर महेश अंकल और ताऊजी जयपुर के लिए रवाना हो गए। जैसे ही ताऊजी घर पहुंचे हम सभी ने चैन की साँस ली। ताऊजी ने जब सभी से पूछा कि हम सभी क्यों घबराए हुए हैं। तो हमनें उनको आज का अखबार दिखाया। उसमें खबर छपी थी – “कल रात को कुछ चोरों ने जयपुर नेशनल हाईवे पर एक कार में जा रहे दो नौजवानों को ना केवल लूटा बल्कि उन दोनों का अपहरण करके वह उन नौजवानों को कहां ले गए यह किसी को नहीं पता।” अब ताऊजी सोच में पड़ गए कि जिस बाप और बेटे ने उन दोनों को आधी रात को राष्ट्रीय मार्ग से नहीं निकलने की चेतावनी दी थी वह आखिर कौन थे। क्या ढाबे की ओर जाने वाली सड़क रहस्यमयी थी?

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