नैतिक कहानी-20 दो भाइयों की कहानी

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Ekta Ranga

रमेश नाम का एक आदमी था। उसके दो बेटे थे। रमेश अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ खूब मजे से रहता था। पेशे से वह एक अंडा व्यापारी था। उसके अंडे का व्यापार भी बहुत अच्छा चल रहा था। लोग रमेश की खूब इज्जत किया करते थे। रमेश के दो बेटे थे।

रमेश दोनों बेटे को खूब प्यार करता था। उसे अपने बेटों पर खूब नाज था। उसके बड़े बेटे का नाम राघव था। और छोटे बेटे का नाम महेंद्र था। दोनों ही बेटे खूब मेहनती थे। वह दोनों ही अपने पिता पर किसी भी तरह से आंच नहीं आने देते थे।

दोनों भाइयों में खूब प्रेम भी था। लेकिन फिर भी ना जाने क्यों बड़े बेटे राघव को यह लगता था कि उसके पिता उसपर इतना भरोसा नहीं करते हैं जितना कि वह महेंद्र पर करते हैं। उसे ऐसा इसलिए लगता था क्योंकि जब भी जिम्मेदारी संभालने की बात आती तो रमेश अपने छोटे बेटे को जिम्मेदारी सौंप देता था।

राघव को ऐसा लगता था कि उसमें ऐसी क्या कमी है कि उसके पिता उसको जिम्मेदारी ना सौंपते हुए छोटे भाई को सौंप देते हैं। वह यह भी महसूस करता था कि बड़े होने के नाते उसको उस प्रकार की जिम्मेदारी नहीं मिलती जितनी कि मिलनी चाहिए। वह इसी बात से थोड़ा दुखी भी रहता था। लेकिन वह यह बात अपने पिता के सामने जाहिर नहीं करता था।

पर एक दिन उससे रहा नहीं गया। उसने सोचा कि आज हिम्मत जुटाकर पिताजी से यह पूछना होगा कि वह उसपर उतना ही भरोसा क्यों नहीं करते हैं जितना कि वह महेंद्र पर करते हैं। वह अपने पिता के पास गया और बोला, “पिताजी, आज मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूं। आप मुझे उसका सही उत्तर देना।”रमेश ने कहा, “बेटा, मैं कब से तुम्हें गलत उत्तर देने लगा हूं। मैं तुम्हें सही उत्तर ही दूंगा। तुम मेरे समाने अपना प्रश्न रखो।

“राघव बोला, “पिताजी, मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि मैं आपका बड़ा बेटा हूँ। लेकिन जब बात आती है जिम्मेदारी संभालने की तो आप महेंद्र को ही सारी जिम्मेदारी क्यों दे देते हैं?” रमेश बोला, “अच्छा, तो तुम्हें इस बात का उत्तर चाहिए। ठीक है इस बात का अभी पता चल जाएगा कि असली जिम्मेदारी क्या है।” फिर रमेश ने दो मिनट तक कुछ सोचा और फिर राघव से कहा, “बेटा, तुम एक काम करो। अपनी जो पोल्ट्री वाली दुकान है ना जिससे हम अंडे खरीदते हैं, तुम वहां जाओ और यह पता करो कि क्या वह अभी इतनी सुबह अंडे देने को तैयार है क्या?”

राघव ने अपने पिता की बात सुनी और वह पोल्ट्री फार्म जाने के लिए रवाना हो गया। वहां पहुंचकर उसने पूछा कि क्या इतनी सुबह उसको अंडे मिल जाएंगे? तो दुकानदार बोला कि अंडे मिल जाएंगे। राघव जल्दी से अपने पिता के पास पहुंचा और बोला कि, “हाँ, पिताजी वह दुकानदार कह रहा है कि इतनी सुबह-सुबह अंडे मिल जाएंगे।” फिर रमेश ने राघव से कहा कि, “अब तुम यह पता करो कि अंडों की कीमत क्या पड़ेगी?” राघव फिर से अंडों की दुकान पर गया और दुकानदार से पूछा, “अंडों की कीमत क्या पड़ेगी?” तो दुकानदार बोला, “जी, ऐसे तो कीमतें अलग अलग है।

लेकिन जिस हिसाब से रमेश भाईसाहब को अंडे चाहिए उसके हिसाब से अंडों की कीमत 100 रुपए प्रति नग पड़ेगी।” राघव ने यह सारी बात अपने पिता को आकर बताई। अब रमेश ने अपने बेटे से कहा कि वह जाकर यह पता करे कि क्या आज शाम तक 20 अंडे दे सकते हैं क्या? राघव ने दुकानदार से पता किया तो दुकानदार का उत्तर हाँ था। यह जानकारी राघव ने अपने पिता को दी।

अब बारी थी रमेश के छोटे बेटे महेंद्र की। रमेश ने महेंद्र को अंडा विक्रेता के पास जाकर यह पता करने को कहा कि अंडे की कीमत आखिर क्या है? महेंद्र अपने पिता के कहे अनुसार अंडे की दुकान तक गया और दोबारा जल्दी ही लौटकर आ गया। उसने अपने पिता से कहा कि, “पिताजी, अंडे बेचने वाले अंकल के पास 200 रुपए के 10 अंडे हैं। और उनके पास 100 रुपए में 20 अंडे हैं।

मैंने उनको कहा कि हमें 100 रुपए के अंडे चाहिए आज शाम तक। तो अंकल ने कहा कि तुम आज शाम को आकर अंडे ले जाना।” फिर रमेश ने अपने दोनों बेटों को अपने पास बुलाया और दोनों की पीठ थपथपाई। लेकिन उसने अपने बड़े बेटे के मुकाबले अपने छोटे बेटे की पीठ ज्यादा तेजी से थपथपाई। अब राघव को इस बात का एहसास हो गया था कि उसके पिता उसकी बजाए महेंद्र को ज्यादा जिम्मेदारी क्यों देते हैं।

इस कहानी से मिलने वाली सीख- इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कभी भी किसी से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। सभी के अंदर अलग अलग प्रकार के गुण मौजूद होते हैं।

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