नैतिक कहानी-37 “बंदर और मगरमच्छ की कहानी”

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Ekta Ranga

बहुत समय पहले एक विशाल जंगल हुआ करता था। उस विशाल जंगल में एक बड़ा सा अंजीर का पेड़ हुआ करता था। वह पेड़ अंजीर के फल से लबालब भरा रहता था। उस पेड़ पर स्वादिष्ट अंजीर के फल लगते थे। अंजीर के फल सभी को ही बहुत अच्छे लगते थे। उसी पेड़ पर सोनू नाम का एक बंदर अपनी पत्नी के साथ रहा करता था। वह दोनों अंजीर के मीठे-मीठे फल खाते और दिन भर उछल कूद करते रहते थे। दोनों बड़े ही मजे से अपना जीवन जीते थे। उसी पेड़ पर खूब सारे पक्षी भी बैठकर अंजीर फल के स्वाद का आनंद लेते थे।

एक दिन जब सोनू बंदर पेड़ पर उछल कूद कर रहा था तब उसकी नजर एक मगरमच्छ पर पड़ी। वह मगरमच्छ बहुत ही ज्यादा थका हुआ लग रहा था। वह जोर जोर से हांफ भी रहा था। वह अंजीर के पेड़ के नीचे छांव में बैठ गया। जब सोनू ने उसे इस हालत में देखा तो उसे उस बंदर पर दया आ गई। बंदर ने पेड़ से नीचे ना उतरते हुए ऊपर से ही पूछा, “मगरमच्छ भाई, तुम इतना थके हुए क्यों लग रहे हो?

“मगरमच्छ ने उदास स्वर में कहा, “क्या करूं भाई, मेरी तो जैसे जान ही निकली जा रही है। मुझे शिकार करना था। मैं एक भैंसा का शिकार करने उसके पीछे भागा था। लेकिन वह भैंसा मुझे चकमा देकर भाग गया। मैं बहुत ज्यादा भूखा हूं, दोस्त।” बंदर ने उसकी हालत देखकर पेड़ से अंजीर के फल तोड़े और मगरमच्छ को खाने के लिए दे दिए। क्योंकि मगरमच्छ को बहुत ज्यादा भूख लगी थी इसलिए वह फटाफट अंजीर खा गया।

फिर मगरमच्छ ने बंदर को खूब आशीष दी। उसने बंदर से कहा, “भाई, आज तुमने एक भूखे का पेट भरा इससे बढ़िया बात और क्या हो सकती है। मैं तुमसे बहुत ज्यादा खुश हूं। क्या आज से हम अच्छे दोस्त बनकर रह सकते हैं?” बंदर बोला, “मगरमच्छ भाई, तुम ऐसा क्यों कह रहे हो? हम बेशक अच्छे दोस्त बन सकते हैं। मुझे तुम्हारा स्वभाव बहुत पसंद आया। मैं भी तुमसे दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहता हूं।

“मगरमच्छ और बंदर ने दोस्ती का हाथ मिलाया और बहुत अच्छे दोस्त बन गए। अब वह हर दिन पेड़ के नीचे आकर मिला करते थे और अंजीर खाकर खूब मस्ती किया करते थे। सोनू बंदर की पत्नी को उन दोनों की दोस्ती पसंद नहीं आती थी। वह हमेशा सोनू से कहा करती थी कि मगरमच्छ से दोस्ती सही नहीं है। लेकिन सोनू बंदर हर दिन अपनी पत्नी को यही समझाता था कि वह मगरमच्छ दूसरे अन्य मगरमच्छ की तरह नहीं है।

फिर एक दिन जब मगरमच्छ अंजीर के फल खाने के बाद अपने घर पहुंचा। घर पहुंचने पर उसकी पत्नी को उसके मुंह से मीठी खुशबू आई। उसकी पत्नी ने कहा, “सुनिए, आज आपके मुंह से यह मीठी खुशबू किस चीज की आ रही है? ऐसी खुशबू पहले तो कभी नहीं आई।” मगरमच्छ ने उसे बंदर की सारी बात बताई दी। उसने अपनी पत्नी से कहा कि उस बंदर का नाम सोनू है। कि वह बंदर उसे हर दिन अंजीर के मीठे फल खिलाता है।

मगरमच्छ की पत्नी को यह सुनकर लालच आ गया। उसने सोचा कि अगर वह बंदर इतना मीठा फल खाता है तो उसका मांस भी कितना मीठा होगा। उसने मगरमच्छ से कहा, “सुनो, तुम कल उस बंदर को यहां ले आना। मैं उस बंदर को खाना चाहती हूं। उस बंदर का मांस कितना मीठा होगा यह सोचकर मेरे मुंह में पानी आ रहा है।

“यह सुनकर मगरमच्छ बोला, “अरे, यह तुम क्या कह रही हो। वह मेरा दोस्त है। तो इस नाते मैं उससे धोखाधड़ी कैसे कर सकता हूं।” मगरमच्छ की पत्नी बोली, “अगर तुम मेरा इतना सा भी काम नहीं कर सकते हो तो मैं भी तुमसे रिश्ता क्यों रखूं। मैं तुम्हें छोड़कर चली जाती हूं।” आखिरकार मगरमच्छ को अपनी पत्नी की बात माननी ही पड़ी।

अगले दिन जब बंदर और मगरमच्छ ने अंजीर के फल खा लिए तो मगरमच्छ बोला, “भाई, आज तुम्हारी भाभी ने तुम्हें खाने पर बुलाया है। वह इतने समय से तुम्हें अपने हाथ का बना खाना खिलाना चाहती है। आज तुम मेरे घर चलो।” सोनू बंदर की पत्नी ने आंखों से नहीं जाने का इरादा किया। लेकिन सोनू इस बात को समझा ही नहीं। वह फट से मगरमच्छ के साथ रवाना हो गया।

जब मगरमच्छ उसको नदी पार करवाकर आधे रास्ते पहुंचा तो उसने कहा, “मुझे माफ करना दोस्त। दरअसल मैंने तुमसे झूठ बोला। मेरी पत्नी तुम्हें खाना नहीं खिलाएगी। बल्कि वह तुम्हें मारकर तुम्हारा मांस खाएगी।” मगरमच्छ की यह बात सुनते ही बंदर का दिमाग एकदम सुन्न हो गया। उसने सोचा कि अब इस मगरमच्छ से कैसे बचा जाए। तभी अचानक बंदर के दिमाग में एक बहुत अच्छी योजना आई।

उसने मगरमच्छ से कहा, “मगरमच्छ भाई, मुझे इस बात पर बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा। लेकिन एक बात तो मैं तुम्हें बताना ही भूल गया। दरअसल मेरे शरीर में जो दिल है वह बहुत ही जहरीला है। अगर तुम्हारी पत्नी मेरे मांस के साथ मेरा दिल भी चबा गई तो वह मर जाएगी। इसलिए बेहतर यही होगा कि अगर मैं अपना दिल अपनी पत्नी को दे आऊं और फिर तुम मुझे अपनी पत्नी के पास ले जाओ।” मगरमच्छ को बंदर की बात में दम लगा।

वह बंदर को अंजीर के पेड़ तक ले गया। अंजीर के पेड़ के पास पहुंचते ही बंदर फट से पेड़ पर जा पहुंचा। फिर उसने तेज आवाज में कहा, “अरे ओ धोखेबाज मगरमच्छ। तुमने मेरी दोस्ती का फायदा उठाया। तुमने मेरे साथ छल किया। तुम शरीर में तो बहुत बड़े हो। लेकिन तुम्हारी अक्ल ना के बराबर है। क्या तुम्हें यह भी पता नहीं कि किसी भी व्यक्ति का दिल जहरीला नहीं होता है? जैसे तुमने मुझ से झूठ बोला ठीक उसी प्रकार झूठ बोला। हमारा हिसाब बराबर हो गया। आज से तुम मेरे दोस्त नहीं रहे।” यह सुनते ही मगरमच्छ का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसे खुद पर शर्म आ रही थी।

इस कहानी से मिलने वाली सीख- इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें हर मुश्किल का सामना बड़ी ही चतुराई के साथ करना चाहिए। हमें कभी भी हिम्मत नहीं हार चाहिए।

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