मुहावरे पर आधारित (कहानी-4) खोदा पहाड़ और निकली चुहिया

पहले के समय में चोर और डाकुओं ने हर जगह आतंक फैला रखा था। डाकू गाँव और शहरों में जाते और हर घर को लूटते चले जाते। लोग परेशान आ गए थे डाकुओं से। लेकिन डाकू बेखौफ होकर चोरी करते। डाकुओं को किसी का भी डर नहीं लगता था। वह सारा लूटा हुआ धन एक गुफा में छुपा देते थे।

एक पुरानी कहावत है कि लूटा हुआ धन हमेशा दुख देता है। शायद डाकुओं के साथ जल्द ही ऐसा ही होने वाला था। एक दिन हर दिन की ही तरह डाकुओं का गिरोह चोरी करके सीधा पहुंच गया गुफा। सभी डाकुओं ने चोरी किया हुआ धन आज फिर से छुपा दिया। लेकिन उन सभी को एक बात का डर था।

डर यह था कि कहीं सिपाही आकर उनको पकड़ ना ले। क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो वह सलाखों के पीछे जाएंगे और उनका लूटा हुआ धन भी उनके हाथ से चला जाएगा। लेकिन किस्मत के चलते सिपाही गुफा की ओर नहीं आया। फिर एक दिन चोर जब चोरी करने जा रहे थे तब उन्होंने सोचा कि क्यों ना एक चोर को गुफा में धन की हिफाजत के लिए रख दिया जाए। ऐसा होने पर धन सुरक्षित रहेगा। एक चोर को गुफा में बैठाकर सारा गिरोह चोरी के लिए निकल पड़ा।

आज रात उस चोर को गुफा में अकेले ही रहना था। दरअसल वह चोर थोड़ा डरपोक स्वभाव का था। वह निडर रहने की कोशिश कर रहा था। लेकिन फिर भी डर उसको अंदर से खाए जा रहा था। उसने सोचा कि क्या किया जाए जिससे कि उसका डर भाग जाए। उसने सोचा थोड़ी झपकी मारने से शायद डर पर काबू आ जाएगा।

उसने जैसे ही झपकी ली कि ठीक उसी समय पायल के छनकने की आवाज आई। उस डाकू की तो मानो जैसे सिट्टी पिट्टी गुम हो गई। उसने सोचा पायल की आवाज गुफा में कैसे आ सकती है। उसने इधर-उधर सब जगह छानबीन की लेकिन उसे कहीं भी कोई दिखाई नहीं दिया।

उसके दिल की धड़कने और भी ज्यादा तेज हो गई। क्योंकि उसने बचपन में भूत प्रेत के खूब किस्से सुने थे इसलिए उसका दिमाग अब भूत प्रेत पर अटक गया। उसने भगवान से प्रार्थना की कि, “हे भगवान आप उसे बचा लेना। अगर यहां भूत प्रेत है तो आप उसको यहां से भगा दो।” फिर थोड़ी देर बाद जब आवाज आना बंद हो गई तब जाकर उस चोर के दिल में चैन आया।

अगली सुबह चोरों का गिरोह गुफा में लौट आया। उस चोर ने रात को हुई सारी घटना को डाकू के सरदार को बता दिया। जब सरदार ने उसकी बात सुनी तो उसे हंसी आ गई। पीछे-पीछे सभी डाकू भी हंस दिए। सरदार ने कहा कि यह चोर तो बहुत डरपोक है इसलिए कल रात को कोई दूसरा डाकू ही गुफा में रहेगा। उस चोर ने यह बहुत समझाने की कोशिश की कि इस गुफा पर भूतों का साया है पर किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।

अगले दिन अब दूसरे चोर को पहरेदारी की जिम्मेदारी मिली। जब सब डाकू डकैती के सिलसिले से दूसरे गाँव गए तो उस समय वह चोर गुफा में अकेला था। वह पहले डाकू से थोड़ा बहादुर था। वह बिना ज्यादा सोचे समझे पहरेदारी के लिए बैठ गया। समय बीत रहा था। दिन का समय अब रात की ओर प्रस्थान कर रहा था।

इतने समय तक तो वह डाकू बेखौफ था। लेकिन जैसे जैसे शाम हो रही थी ना जाने क्यों उतनी ही बैचेनी उसके मन में उत्पन्न हो रही थी। उसने तो कल पहले वाले डाकू का मज़ाक़ बनाया था। फिर आज ऐसा क्या हो गया कि उसके भी मन में चैन नहीं था। उसको भी एक अजीब सा डर लगने लगा।

अब रात को सोने का समय आ गया था। जैसे ही वह नींद लेने लगा, उसे पायल के छन छन की आवाज सुनाई दी। उसे लगा कि यह उसका वहम होगा। पर जब दूसरी बार भी पायल की आवाज सुनाई दी तो उसने आखिरकार यह मान लिया कि पहला चोर एकदम सच बोल रहा था। कैसे तैसे करके उसने रात काटी।

जब सुबह हुई और सभी डाकू वापिस लौटे तो उस चोर ने भी सभी को यही बताया कि पहला वाला चोर एकदम सही कह रहा था। इस गुफा में सच में भूत प्रेत निवास करते हैं। अब यहां पर रुकने में कोई भलाई नहीं है। पर ना जाने क्यों डाकू के सरदार को उन सभी की बातों पर विश्वास नहीं हुआ।

उसने उसी समय यह निर्णय लिया कि वह पता लगा कर रहेगा कि आखिर वह कौन है जो रात को गुफा में आता है। उसने दोनों चोरों से पूछा कि आवाज आखिर कहां से आती है तो उन दोनों ने जवाब दिया कि घुँघरू की आवाज गुफा के बाहर बने बिल के आस-पास आती है। उस सरदार ने यह आदेश दिया कि बिल की खुदाई की जाए।

अब चोरों ने बिल की खुदाई शुरू कर दी। बिल को कई देर तक खोदा गया लेकिन जब कोई दिखाई नहीं दिया तो चोर अंत में थककर हार के बैठ गए। उन सभी को बैठे हुए 5-10 मिनट बीते ही थे कि अचानक घुँघरू की आवाज फिर से सुनाई दी। अब चोरों ने ग़ौर से चारों तरफ देखा। अंत में उनकी नजर एक चुहिया पर पड़ी जिसके एक पैर में घुँघरू बंधे थे। हो सकता है किसी ने उसके पैर में यह बाँध दिए थे।

अब जैसे ही उनको यह पता चला कि उस बिल पर किसी भूत नहीं बल्कि एक चुहिया ने कब्ज़ा कर रखा था तो उनकी हंसी का कोई ठिकाना नहीं रहा। उस चुहिया को देखकर एक चोर बोला, “खोदा पहाड़ और निकली चुहिया। हमनें क्या सोचा था और हमें देखने को क्या मिला यह मजेदार और सोचने वाली बात है। खोदा पहाड़ और निकली चुहिया वाला मुहावरा यही से ही प्रचलन में आया।

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