मुहावरों पर आधारित (कहानी-7) जैसा देश वैसा भेष

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Ekta Ranga

नवनीत आज 12 वी बोर्ड की परीक्षा के परिणाम का इंतजार कर रहा था। आज वह भोर में 4 बजे ही उठ गया था। उसने दिनचर्या के सारे काम निपटाए और जल्दी से कंप्युटर के आगे आंखें गढ़ाकर बैठ गया। उसके सभी पेपर बहुत अच्छे हुए थे। उसको उम्मीद थी कि उसका नाम मेरिट में आएगा। और वही हुआ। आखिर रिजल्ट आ गया। उसने पूरे गाँव में टॉप किया था। उसे मेरिट में स्थान मिला था।

उसके माता-पिता भी इस बात से बहुत खुश थे कि आखिर उनके बेटे की मेहनत रंग लाई। पर कहीं कहीं उसके माता-पिता को इस बात की भी बड़ी चिंता थी कि अब उनका इकलौता बेटा गाँव से दूर शहर पढ़ने चला जाएगा। नवनीत तो आज मानो सातवें आसमान पर था। उसने अपने भविष्य को लेकर खूब सारे सपने संजोए थे। शायद वह सपने अब पूरे होने वाले थे। वह गरीब किसान का बेटा था। नवनीत के माता-पिता ने अपने जीवन में पैसों के चलते बहुत दुख देखे थे। वह दुख अब दूर होने वाले थे।

नवनीत को डॉक्टर बनना था। इसलिए उसे एमबीबीएस करने की सोची। सरकार की तरफ से उसे देश की अच्छी सरकारी कॉलेज में दाखिला मिल गया था। नवनीत को 15 दिन बाद में शहर की कॉलेज जाना था। नवनीत ने तैयारी शुरू कर दी थी। वह अपने कमरे को व्यवस्थित कर ही रहा था कि अचानक उसके पिताजी कमरे में आए।

पिताजी ने नवनीत को अपने पास बुलाया और कहा, “बेटा, मैं आज तुम्हारी तरक्की से बहुत ज्यादा खुश हूं। मुझे गर्व है कि हमारा बेटा अब जल्द ही डॉक्टर बनेगा। पर बेटा एक बात है जो मैं तुझसे कहना चाहूँगा। मैं चाहता हूं तुम शहर जाकर गाँव के तौर तरीके ना भूल जाओ। इसलिए कोशिश यही करना कि तुम गाँव की संस्कृति को बनाए रखो।” नवनीत ने पूछा, “गाँव की संस्कृति कैसे बचानी होगी?” बाप ने कहा, “तुम शहर जाकर ज्यादा अंग्रेजी बोलने के चक्कर में मत पड़ना।

शहर में भी धोती और कुर्ता पहनना। और हाँ, वहां के खानपान की बजाए गाँव के खानपान को ही महत्व देना।” बेटे बोला, “जी, पिताजी। मैं गाँव की संस्कृति को नष्ट नहीं होने दूंगा। मैं हर पल अपने आप को यही याद दिलाऊंगा कि मेरी जड़ें गाँव से जुड़ी है।”

कुछ दिन बाद नवनीत शहर की कॉलेज में पढ़ने के लिए रवाना हो गया। वहां पहुंचकर उसे एकदम ही अलग लगा। वहां पर बड़ी बड़ी इमारतें थी। लोगों की लाइफस्टाइल एकदम अलग थी वहाँ पर। हर जगह कपड़ों की बड़ी दुकानें थी। बड़े सिनेमा हॉल थे। बड़े और भव्य मॉल थे। यहां पर कोई भी उसके उम्र के लड़के धोती कुर्ते में नजर नहीं आ रहे थे। जब वह सड़क पर चल रहा था तो उसे सभी लोग अजीब सी नजरों से देख रहे थे। यह सब देख कर उसे खुद के पहनावे से शर्म भी आ रही थी। लेकिन उसने अपने पिताजी से वादा किया था कि वह खुद को बिल्कुल भी नहीं बदलेगा।

जब वह कॉलेज एडमिशन लेने पहुंचा तो चौकीदार ने वहां पर उसे घुसने नहीं दिया। उसने जब चौकीदार से कहा कि वह इस कॉलेज में एडमिशन लेने आया है तो उस चौकीदार ने कहा कि यह कॉलेज गरीब और अनपढ़ लोगों के लिए नहीं है। फिर काफी देर बहस के बाद उसे अंदर आने दिया।

उस कॉलेज के प्रिंसिपल ने जब उसे ऐसे देखा तो कहा, “माफ़ करना जो उस चौकीदार ने तुम्हारे साथ ऐसा बर्ताव किया। पर बेटा इसमें उसकी भी कोई गलती नहीं है। उस बेचारे ने तो सोचा होगा कि तुम कोई गरीब लड़के हो जो काम के सिलसिले से यहां आया हो।” लड़के ने कहा, “पर सर हम गाँव वाले भी तो एक इंसान होते हैं ना। फिर हमारी वेषभूषा या फिर हमारी बोलचाल से कोई फर्क़ नहीं पड़ना चाहिए। और मैं तो अपने गाँव का टॉपर हूं।

मुझे खुद सरकार ने इस कॉलेज में दाखिला दिया है। फिर भी भेदभाव क्यों? और आज जब मैं कॉलेज की तरफ आ रहा था तो मैंने देखा कि लोग मुझे देखकर हंस भी रहे थे।” प्रिंसिपल ने कहा, “तुमनें एकदम ठीक कहा कि गाँव वाले भी इंसान होते हैं। यह मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि एक समय पर मैं खुद तुम्हारी ही तरह गाँव से आया था। लोगों ने मेरा बहुत मज़ाक़ उड़ाया था। मेरी वेषभूषा पर, मेरी बोलचाल पर।

फिर मैंने सोचा कि मुझे अपनी भाषा और पहनावे को बदलना पड़ेगा। मैंने अंग्रेजी सीखनी शुरू की। मैंने शहरी कपड़े पहनने शुरू कर दिए। तब जाकर मुझे इस ओहदे तक पहुंचने का मौका मिला। उस दिन से मैंने यह कसम खाई कि मैं तुम्हारे जैसे बच्चों का भविष्य सुधारूंगा। आज मैं तुम्हें जीवन का एक अच्छा मंत्र सिखाना चाहता हूं कि जैसा देश वैसा भेष।” बस उस दिन से नवनीत ने यह मंत्र सीख लिया कि जैसा देश होता है वैसा ही भेष हमें अपना लेना चाहिए।

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