तेनालीराम की कहानी-3 ”तेनालीराम और मटके की कहानी”

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Ekta Ranga

राजा कृष्णदेव राय और तेनालीराम की जोड़ी को हमेशा से ही सराहा जाता रहा है। उनकी जोड़ी की आज भी हर कोई तारीफ करता है। उन दोनों में घनिष्ठ मित्रता थी। लेकिन कई बार ऐसा भी हो जाता था जब राजा तेनालीराम से बेहद नाराज हो जाते थे। एक बार राजा कृष्णदेव राय और तेनालीराम में इतनी बहस हुई कि राजा उससे नाराज हो गए थे। तेनालीराम ने राजा को मनाने की खूब कोशिश की लेकिन राजा ने उसकी एक भी ना सुनी।

आखिरकार राजा को तेज गुस्सा आ गया और उसने तेनालीराम से कहा, “तेनालीराम, जब हम यह कह चुके हैं कि हम आपकी शक्ल नहीं देखना चाहते हैं तो फिर क्यों आप हमसे बात करके हमें गुस्सा दिला रहे हैं?” तेनालीराम ने कहा, “हम ऐसा इसलिए कर रहे हैं महाराज क्योंकि हम आपसे बात किए बगैर एक पल भी नहीं रह सकते हैं। आप हमारे राजा से पहले हमारे घनिष्ट मित्र हैं।

“राजा ने कहा, “पर हम आपसे बात करना ही नहीं चाहते हैं। आगे से आप हमें अपनी शक्ल दिखाने की हिम्मत मत करना। क्योंकि अगर आपने हमारी कही बात का उल्लंघन किया तो समझ लेना कि हमसे बुरा कोई नहीं होगा। अब आप यहां से शीघ्र अतिशीघ्र चले जाएं अथवा हमें कुछ गलत करने को मजबूर होना पड़ेगा।” तेनालीराम ने सोचा कि अब ज्यादा बात करने से महाराज और ज्यादा भड़क जाएंगे। इसलिए बेहतर होगा कि वह दरबार से चले जाएं। फिर तेनालीराम वहां से रवाना हो गए।

अब कई दिन गुजर गए जब तेनालीराम दरबार ही नहीं आए। अब राजा को कहीं कहीं तेनाली की कमी खलने लगी थी। राजा यह बात किसी को बोल नहीं पा रहे थे लेकिन अंदर से वह मायूस थे। लेकिन फिर उनको जब पुरानी बात याद आ जाती तो वह तेनाली पर फिर से गुस्सा हो उठते। एक दिन हर दिन की तरह दरबार लगने ही वाला था कि महल में हड़कंप मच गया। बात यह हो गई थी कि महल में कोई मटका पहने हुए आदमी घुस आया था।

किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि वह आखिर कौन था। अचानक ही एक मंत्री ने उस मटके वाले आदमी की आवाज पहचान ली। वह समझ गया था कि यह तो कोई और नहीं बल्कि तेनाली था। वह मंत्री नहीं चाहता था कि तेनालीराम दुबारा महल आए। क्योंकि ऐसे में उसकी नौकरी जा सकती थी।

यह पता चलते ही कि वह तेनालीराम था, वह मंत्री झट से राजा के पास गया और राजा से बोला, “महाराज, आपने तेनालीराम को अपनी शक्ल नहीं दिखाने को बोला था। लेकिन महाराज तेनालीराम ने आपकी आज्ञा का अनादर किया है। आप उसे कड़ी से कड़ी सजा देना।

“महाराज को जैसे ही पता चला कि तेनालीराम ने उसकी आज्ञा की अवहेलना की है तो राजा आग की तरह क्रोधित हो उठे। वह तेनालीराम के पास पहुंचे और बोले, “क्या यह तुम हो तेनालीराम?” वह आदमी बोला, “जी, हां, महाराज। मैं तेनालीराम ही हूँ” राजा बोला, “तुम्हारी इतनी हिम्मत कि तुम मेरी अनुमति के बिना महल पहुंच गए। किसने कहा था तुम्हें यहां आने का।

“तेनालीराम बोला, “जी महाराज मैं जानता हूँ कि आप मुझसे अभी भी नाराज हैं। लेकिन मैं आपसे बात किए बिना रह नहीं सकता। मैं यह भी जानता हूं कि आपने मेरी शक़्ल नहीं देखने का प्रण खाया था। लेकिन मैंने भी आपका प्रण नहीं तोड़ा और मैं आपसे यह मटका पहने ही बात कर रहा हूं।

“जैसे ही तेनालीराम ने अपने शब्द पूरे किए वैसे ही वहां पर उपस्थित सभी लोग हंसने लगे। राजा कृष्णदेव राय भी अपनी हंसी रोक नहीं पाए। वह बोले, “तुमनें एकदम सही कहा तेनालीराम। दरअसल मैं भी तुमसे बात किए बिना तड़प रहा था। कहना पड़ेगा कि तुम हमेशा अपनी चतुराई से मुझे हरा देते हो।” राजा के शब्द पूरे होते ही सभी हंसने लगे।

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