विक्रम बेताल की कहानी-9 पिंडदान का अधिकारी कौन?

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Ekta Ranga

विक्रम आज फिर बेताल को अपने साथ लिए जंगल की ओर जा रहा था। रास्ते में चलते हुए विक्रम की नजर एक आदमी पर पड़ी। विक्रम ने देखा कि वह आदमी पिंडदान की प्रकिया पूरी कर रहा था। विक्रम को यह पिंडदान का धार्मिक संस्कार बहुत रोचक लगता था। उस आदमी को देखकर विक्रम को पिंडदान जैसे विषय पर कहानी सुनने की इच्छा हुई। उसने बेताल से कहा कि वह पिंडदान पर आधारित कहानी सुनना चाहता है। बेताल विक्रम को पिंडदान पर आधारित कहानी सुनाने को राजी हो गया। उसने कहानी कहनी शुरू की।

बहुत समय पहले की बात है जब लालपुर नाम का एक गाँव हुआ करता था। उसी गाँव में भागवती नाम की महिला अपने पति धनसुख और बेटी धनवंती के साथ रहा करती थी। धनसुख एक धनवान ज़मींदार था। वह तीनों ही बड़े ही सुख और आनंद के साथ अपना जीवन जी रहे थे। उनको धन और किसी भी बात की कोई कमी नहीं थी।

लेकिन एक दिन उनके जीवन पर एक बड़ा कहर टूट पड़ा। एक दिन धनसुख की अचानक ही मृत्यु हो गई। अपने पति की मृत्यु से भागवती बिल्कुल टूट सी गई। भागवती ने अपने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह विधवा हो जाएगी। रही सही कसर धनसुख के रिश्तेदारों ने निकाल दी। उन सभी ने भागवती को विधवा करार करते हुए उसे अपनी बेटी के साथ घर से बेदखल कर दिया। अब वह अपने गाँव से दूसरे गाँव को जाने पर विवश थे।

जब वह कई दिन तक चलते-चलते दूसरे गाँव पहुंचे तो वह वहां पर अपने लिए एक बेहतर आशियाना ढूंढने लगे। एक दिन चलते हुए जब वह माँ-बेटी थक गए तो दोनों जंगल में एक विशाल पेड़ के नीचे थकान मिटाने बैठ गए। पेड़ के दूसरे छोर पर उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति पेड़ से बंधा था। और उसके पास में ही एक पहरेदार उसकी पहरेदारी कर रहा था।

वह व्यक्ति उस पहरेदार से बार बार एक ही विनती कर रहा था कि उसे वह पानी पीला दे। लेकिन पहरेदार ने उसकी बात को अनसुना कर दिया। यह सब देख कर दोनों माँ बेटी को उस व्यक्ति पर दया आ गई। धनवंती जल्दी से पास पड़े एक घड़े में पानी भर लाई। उसने जल्दी से उस व्यक्ति को पानी पिलाया। जैसे ही उस व्यक्ति की प्यास शांत हुई उसने धनवंती को खूब आशीष दी।

पास खड़ा वह पहरेदार यह सब देख रहा था। उसने दोनों माँ-बेटी से कहा, “अरे, तुम दोनों इस आदमी पर दया क्यों दिखा रहे हो?” यह आदमी दया के लायक नहीं है। यह तो एक बड़ा चोर है जिसने खूब सारी चोरियां की है।” वह चोर उन दोनों से बहुत प्रभावित हो गया था। उसने धनवंती से विवाह करने की इच्छा जताई।

यह बात सुनकर भागवती ने चोर पर गुस्सा होते हुए बोली, “क्या मैं पागल हो गई हूं जो मैं अपनी बेटी का विवाह तेरे जैसे चोर से कराऊंगी। एक चोर मेरी बेटी का पति नहीं बन सकता।” इस बात पर उस पहरेदार ने भी चोर को डांट फटकार लगाई। पहरेदार उस पर जोर से हंसा और बोला, “अभी कुछ ही दिनों बाद में तुझे फांसी पर लटकना होगा और तुझे अभी भी शादी रचाने की सूझ रही है। तुझे शर्म नहीं आती ऐसा सोचते हुए।”

चोर ने अपनी बात को दोबारा दोहराते हुए कहा, “मुझे पता है कि तुम सभी को मेरी बात बहुत अजीब लग रही है। लेकिन मुझे अभी शादी करना बहुत महत्वपूर्ण लग रहा है। मैं तो थोड़े दिन बाद मर जाउंगा। उसके बाद पीछे से मेरे लिए पिंडदान कौन करेगा?” फिर चोर ने धनवंती से कहा कि वह कृपया करके उससे शादी कर ले। और जब वह मर जाए तो उसके द्वारा लुटे हुए धन को अपने पास रखकर वह सारी जिंदगी काट ले। पैसे की बात सुनते ही जैसे मानो भागवती को लालच आ गया। उसने चोर की बात मान ली और धनवंती की शादी चोर से करवा दी।

थोड़े दिन के लिए चोर को बहुत ज्यादा आनंद प्राप्त हुआ। अपनी पत्नी धनवंती से उसे पुत्र की प्राप्ति भी हुई। लेकिन उसका सुख ज्यादा दिन तक नहीं टिक सका। वह दिन जल्दी आ गया जब चोर को फांसी पर लटका दिया गया। सबसे ज्यादा दुख अगर किसी को हुआ तो वह धनवंती ही थी। धनवंती भी अब अपनी माँ की तरह ही विधवा हो गई थी।

चोर के मर जाने के बाद धनवंती अपने पुत्र और अपनी माँ के साथ रहने लगी। कई दिन बाद भागवती को याद आया कि चोर ने जो धन गुफा में छुपा रखा था वह उन दोनों माँ और बेटी को लेना था। भागवती ने गुफा में जाकर जब धन ढूँढा तो वह धन उसे मिल गया। अब भागवती अपनी बेटी और अपने नाती के साथ बड़े ही आनंद के साथ रहने लगी। उसने सोचा कि उसकी बेटी उसकी तरह विधवा ना रहे इसलिए उसने अपनी बेटी की दूसरी शादी करवाने की सोची।

उसने अपनी बेटी के लिए कई घरों पर रिश्ते की बात चलवा दी। एक दिन पैसे के लालच में एक गरीब ब्राह्मण का लड़का आया और उसने धनवंती से शादी करने की इच्छा जताई। भागवती इस रिश्ते के लिए मान गई और गरीब ब्राह्मण लड़के और धनवंती की शादी हो गई। उनके जीवन में फिर से खुशियां छा गई। लेकिन जल्दी ही एक बड़ी अनहोनी घट गई। दरअसल वह ब्राह्मण युवक धनवंती के घर का सारा धन लेकर भाग गया। वह दोनों माँ बेटी फिर से गरीब और लाचार हो गई थी।

एक दिन भागवती ने सुना कि वरदपुरी नाम के राज्य में राजा गरीब लोगों को अपने राज्य में शरण देता है। फिर क्या था, वह दोनों माँ बेटी वरदपुरी की ओर निकल पड़ी। रास्ते में जब वह जंगल से होकर गुजर रही थी तो उन्होंने देखा कि एक बच्चे के गले को बड़े से अजगर ने जकड़ रखा था। यह देखकर वह दोनों बच्चे के लिए चिंतित हो उठी। धनवंती अपनी जान की परवाह किए बगैर ही बच्चे को अजगर के चंगुल से बचाने के लिए दौड़ पड़ी। उसने कैसे तैसे बच्चे को अजगर के मुंह से छुड़वाया, लेकिन वह बच्चा ज्यादा देर तक जिंदा नहीं रहा। उधर राजा अपने बेटे को ढूँढता हुआ उस जगह आ पहुंचा जहां पर राजकुमार मृत पड़ा था। जब उसने सिपाहियों के मुंह से धनवंती के साहस के बारे में सुना तो उसे बहुत अच्छा लगा।

वह वरदपुरी का राजा था। उसने भागवती और धनवंती को अपने राजमहल में शरण दे दी। और राजा ने धनवंती के बेटे को भविष्य का राजा घोषित कर दिया। कई साल बीत गए। धनवंती का बेटा बड़ा हो गया था। फिर थोड़े सालों बाद ही राजा का देहांत हो गया और धनवंती का बेटा वरदपुरी का राजा बन गया। धनवंती ने अपने बेटे से कहा कि, “अब समय आ गया है जब तुम्हें अपने पिता का पिंडदान करना होगा।” बेटा जब पिंडदान करने के लिए एक नदी के किनारे पहुंचा तो उसे तीन अलग अलग हाथ नजर आए।

और बेताल ने अपनी कहानी खत्म की। फिर बेताल ने विक्रम से कहा, “राजन, मैंने अपनी कहानी खत्म की। तो अब तुम मुझे यह बताओ कि आखिर धनवंती के बेटे ने किसका पिंडदान किया? और कौन उसका पिता हुआ?” विक्रम बोला, “देखो बेताल, जैसा कि तुमनें बताया कि कहानी के अंत में तीन हाथ दिखे थे। तो वह तीन हाथ दरअसल तीन लोगों के थे। पहला हाथ उस चोर का था। दूसरा हाथ राजा का था।

तीसरा हाथ उस ब्राह्मण युवक का था। तो मेरे मुताबिक उस लड़के का पिता वह चोर ही हुआ। चोर ने पूरे विधि-विधान से धनवंती को अपनी पत्नी माना था। धनवंती को उसी चोर से ही पुत्र की भी प्राप्ति हुई। अगर बात करे ब्राह्मण युवक की तो वह धूर्त निकला। और राजा ने उस लड़के को राजा इसलिए बनाया क्योंकि उसकी माँ धनवंती ने उसके बेटे की जान बचाने की पूरी कोशिश की थी।” जैसे ही बेताल ने सही जवाब सुना वह पेड़ की ओर उड़ चला।

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