Class 9 History Ch-2 “यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति” Notes In Hindi

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Navya Aggarwal

इस लेख में छात्रों को एनसीईआरटी 9वीं कक्षा की इतिहास की पुस्तक यानी ”भारत और समकालीन विश्व-1” के अध्याय- 2 “यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति” के नोट्स दिए गए हैं। विद्यार्थी इन नोट्स के आधार पर अपनी परीक्षा की तैयारी को सुदृढ़ रूप प्रदान कर सकेंगे। छात्रों के लिए नोट्स बनाना सरल काम नहीं है, इसलिए विद्यार्थियों का काम थोड़ा सरल करने के लिए हमने इस अध्याय के क्रमानुसार नोट्स तैयार कर दिए हैं। छात्र अध्याय- 2 इतिहास के नोट्स यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

Class 9 History Chapter-2 Notes In Hindi

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अध्याय-2 “यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति“

बोर्डसीबीएसई (CBSE)
पुस्तक स्रोतएनसीईआरटी (NCERT)
कक्षानौवीं (9वीं)
विषयसामाजिक विज्ञान
पाठ्यपुस्तकभारत और समकालीन विश्व-1 (इतिहास)
अध्याय नंबरदो (2)
अध्याय का नाम“यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति”
केटेगरीनोट्स
भाषाहिंदी
माध्यम व प्रारूपऑनलाइन (लेख)
ऑफलाइन (पीडीएफ)
कक्षा- 9वीं
विषय- सामाजिक विज्ञान
पुस्तक- भारत और समकालीन विश्व-1 (इतिहास)
अध्याय- 2 “यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति”

फ्रांसीसी क्रांति के पश्चात विश्व के अन्य हिस्सों में भी व्यक्ति अधिकारों और सामाजिक सत्ता के नियंत्रण पर चर्चा होने लगी, एशिया और यूरोप में परिवर्तन की दिशा में देखा जाने लगा। यूरोप में परिवर्तन को लेकर दो मत बने एक में परिवर्तन की गति धीरे रखने की बात कही गई, दूसरी ओर पूर्ण पुनर्गठन की बात होने लगी। इन मतों में रूढ़िवादी, उदारवादी और रैडिकल वर्ग शामिल थे।

विभिन्न समूहों का विभाजन

उदारवादी समूह
  • इन्होंने सभी धर्मों को बराबर और सम्मान की दृष्टि से देखा। इन समूहों ने वंश से संबंधित सत्ता, और कानून द्वारा नागरिकों के अधिकारों के हनन का विरोध किया। ये वर्ग लोकतांत्रिक के पक्ष में नहीं थे।
रैडिकल समूह
  • यह देश में बहुमत की सरकार बनने के पक्ष में थे, इन्होंने महिला मताधिकार को भी समर्थन दिया, इन्होंने विशेषाधिकारों का विरोध किया, निजी संपत्ति का विरोध नहीं, लेकिन कुछ सीमित लोगों के पास इसका केंद्र नहीं होना चाहिए।
रूढ़िवादी समूह
  • इन्होंने 18वीं सदी तक परिवर्तन का विरोध किया। लेकिन इनका मत था कि अतीत का सम्मान करते हुए धीमी गति में परिवर्तन किया जाना चाहिए।
  • इन मतों और विचारधाराओं के बीच फ्रांसीसी क्रांति के बाद मतभेद देखने को मिले।
औद्योगिक और सामाजिक परिवर्तन
  • यह वह समय था जब औद्योगिक क्रांति हो रही थी, इसमें नगरों की बसावट और उनका विकास किया जा रहा था। इस समय बेरोजगारी बड़े स्तर पर थी, इन समस्याओं का समाधान उदारवादी और रैडिकल दोनों विचारधारा के लोग ढूंढ रहे थे।
  • उदारवादी समूहों में भी लोग जो धन संपत्ति लिए हुए थे, ने ऐसे समाज की कल्पना की जहां नागरिक पढ़े-लिखे और स्वस्थ हों, वे जन्मजात मिले विशेषाधिकारों के विरोधी थे। यही कारण रहा कि 19वीं सदी में कई मजदूर इस समूह के साथ दिखाई दिए।
  • कार्ल मार्क्स का भी इसपर मत था की औद्योगिक समाज पूंजीवादी समाज है, पूँजीपतियों का मुनाफा यहाँ काम कर रहे मजदूरों से ही है, इसलिए पूँजीपतियों के मुनाफे का धन संचय कर लेना इन मजदूरों की प्रगति के लिए सही नहीं है।
  • उन्होंने मजदूरों को एक भिन्न समाज बनाने और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने को कहा, एक ऐसा समाज बनाने की बात कही जहां संपत्ति पर पूरे समाज का अधिकार हो, व्यक्ति का नहीं। इसे कॉम्युनिस्ट समाज की संज्ञा दी गई।

समाजवादी विचारधारा का फैलाव

  • 1870 तक यूरोप में समाजवादी विचार का फैलाव हुआ, इन्होंने एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था का निर्माण किया, जिसे द्वितीय इंटरनेशनल के नाम से जाना गया।
  • जर्मनी और इंग्लैंड के मजदूरों ने अपने राजनीतिक अधिकारों की मांग उठाई। ब्रिटेन के समाजवादियों ने 1905 में लेबर पार्टी बनाई, हालांकि ये समाजवादी पार्टियां सरकार बनाने में असफल रहीं, सरकार बनाने का दबदबा केवल रैडिकल, रूढ़िवादी, उदारवादी विचारधारा का ही बना हुआ था।
रूसी क्रांति का कारण
  • 1917 में रूस में सरकार पर समाजवादी विचारधारा ने कब्जा किया, 1914 के समय में रूस में जोर निकोलस-II का साम्राज्य था। यहाँ रूसी ऑर्थोडॉक्स क्रिश्चियैनिटी मानने वालों की संख्या अधिक थी, और इनके साथ कैथलिक, प्रोटेस्टेंट, बौद्ध और मुस्लिम भी शामिल थे।
  • रूस की 85% जनता का जुड़ाव खेती-बाड़ी से था और रूस अनाज का बड़ा निर्यातक था। उद्योगों की संख्या में कमी थी। कई कारखानों की शुरुआत 1890 के बाद शुरू हुई थी।
  • कारखानों पर निजी अधिकार ज्यादा थे, जिनमें मजदूरों के कार्यों को लेकर कुछ घंटे निर्धारित किए गए थे, जिसके आधार पर उन्हें वेतन दिया जाता था।
  • इन मजदूरों की बसावट धीरे-धीरे शहरों में ही होने लगी। महिला मजदूरों का प्रतिशत 31 था, और इन्हें पुरुषों के मुकाबले कम वेतन दिया जाता था।
  • इन हालातों में भी यदि किसी मजदूर को निकाल दिया जाता या कोई विभेद होने की स्थिति में सभी मजदूर एकत्रित होकर हड़ताल करते थे।
  • देहाती जमीनों पर किसानों और बड़ी संपत्तियों पर सामंतों और राजाओं का कब्जा बना हुआ था। सामंतों और नवाबों को जो प्रतिष्ठा मिली थी वह ज़ार की देन थी।
  • फ्रांसीसी क्रांति के विपरीत रूस के किसानों का मानना था कि नवाबों की जमीनों को किसानों को दे दिया जाए। इसी सिलसिले में जमींदारों की हत्या कर दी गई, यह 1905 में अधिक हुआ।
रूस में समाजवाद
  • 1914 में रूस में पार्टियों के गठन पर प्रतिबंध था, समाजवादी विचारधारकों ने 1898 में एक पार्टी का गठन किया और सरकार से छिपकर गैर कानूनी ढंग से काम करना शुरू किया।
  • रूस में समाजवादी स्थापना की जिम्मेदारी किसानों को सौंप दी गई। 1900 में समाजवादी क्रांतिकारी पार्टी का गठन किया गया जिसकी मांग थी किसानों को जमीने मुहैया कराना, इसका विरोध सामाजिक लोकतंत्र ने किया, उनके अनुसार किसान कई वर्गों में विभाजित हैं और इन्हें समाजवादी आंदोलन का हिस्सा नहीं होना चाहिए।

1905 की क्रांति

  • रूस में सत्ता का निरंकुश दौर चल रहा था, जिसे उदारवादी खत्म करना चाहते थे। 1905 में इन्होंने संविधान के लिए काम करना शुरू कर दिया। 1904 में कुछ श्रमिकों को काम से हटा दिया गया, जिसके बाद सेंट पीटर्सबर्ग में 110,00 से भी अधिक मजदूरों ने कई मांगों के साथ हड़ताल शुरू कर दी।
  • इस समय ही पादरी गैपॉन के नेतृत्व में मजदूरों का जुलूस जार के महल की ओर बढ़ा, जिसके कारण हमले आरंभ हुए और कई मजदूरों को अपनी जान गंवानी पड़ी। इस घटना को खूनी रविवार के नाम से जाना गया।
  • इस स्थिति में देश के कई विश्वविद्यालयों को बंद कर दिया गया और मध्यवर्गी कामगारों ने संविधान सभा के गठन की मांग उठाई।
  • 1905 में जार ने निर्वाचित परामर्श दाता यानी संसद (ड्यूमा) को मंजूरी दी। जार द्वारा पहली और दूसरी ड्यूमा का निष्कासन कर दिया गया और तीसरी ड्यूमा में रूढ़िवादियों की संख्या को बढ़ा दिया ताकि उसके शासन पर नियंत्रण न रखा जा सके।
प्रथम विश्व युद्ध और रूस का साम्राज्य
  • 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध दो यूरोपीय खेमों के बीच हुआ, जिसमें एक तरफ जर्मनी, ऑस्ट्रिया और तुर्की तथा दूसरी तरफ फ्रांस, ब्रिटेन और रूस थे। यह युद्ध यूरोप के बाहर तक फैला।
  • जब तक जार ने ड्यूमा की सलाह से युद्ध किया। इसको जनता का साथ मिला, लेकेिन इसके बाद जार ने यह सलाह लेना छोड़ दिया।
  • पश्चिम में सैनिकों की स्थिति बेहद खराब थी और बड़ी संख्या में सैनिक मारे जा रहे थे, जिससे उनका मनोबल टूट रहा था। जर्मनी और ऑस्ट्रिया में रूस की पराजय हुई।
  • 1917 तक 70 लाख लोग मारे जा चुके थे। रूसी सेना ने वापस आते हुए रास्ते में कई फ़सलो और इमारतों को नुकसान पहुंचाया, जिससे करीब 30 लाख लोग शरणार्थी हो गए।
  • इससे उद्योगों का भी नुकसान हुआ, जर्मनी के कब्जे के कारण अब रूस के पास बाल्टिक समुद्र के रास्ते से आने वाली आपूर्ति भी बंद हो गई।
  • युद्ध के समय में ज्यादातर अनाज सैनिकों को मुहैया कराने के कारण नागरिकों को अनाज कम मिलने लगा, जिससे दुकानों पर अनाज को लेकर दंगे होने लगे।
पेत्रोग्राद में क्रांति
  • देश की राजधानी में 1917 में सर्दियों ने कहर बरपाया, फरवरी के महीने में मजदूरों के इलाकों में खाद्य सामग्रियों की कमी हुई, और इस वर्ष अत्यधिक ठं हुई, इस समय में निर्वाचित सदस्यों को बनाए रखना अहम था और संसदीय प्रतिनिधि ड्यूमा को भंग करने के जार के निर्णय का विरोध कर रहे थे।
  • इस समय में कुछ कारखानों पर तालाबंदी की घोषणा कर दी गई, जिसका विरोध 50 कारखानों के मजदूरों ने किया, इनका नेतृत्व महिलाओं ने किया। इसी दिन को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है।
  • जब आंदोलनकारियों ने बड़े इलाकों की घेराबंदी की तब सरकार ने कर्फ्यू लगा दिया। 25 फरवरी को सरकार ने ड्यूमा को फिर बर्खास्त कर दिया।
  • 27 फरवरी को इन्होंने पुलिस के मुख्यालय पर हमला कर दिया, घुड़सवारों ने आन्दोलनकर्ताओं पर गोली चलाने से मना कर दिया और इनके साथ ही मिल गए। मजदूरों और सिपाहियों ने सोवियत (परिषद) बनाने का निर्णय लिया।
  • अगले दिन जार को राजगद्दी छोड़ने की सलाह दी गई, उसने 2 मार्च को गद्दी छोड़ दी। अब देश में सोवियत और ड्यूमा के नेताओं की सरकार बनी।
  • भविष्य के फैसलों के लिए संविधान सभा को जिम्मेदारी दी गई, और वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव कराने का निर्णय किया गया।
फरवरी के बाद का माहौल
  • उदारवादी और समाजवादियों का मानना था कि जल्द से जल्द निर्वाचित सरकार का गठन किया जाए, अप्रैल, 1917 में व्लादिरमीर लेनिन रूस लौट आए और आते ही तीन निर्णय सुनाए, जिसमें युद्ध समाप्ति, किसानों को जमीनें वापिस करना और बैंको का राष्ट्रीकरण शामिल था, इसे लेनिन की अप्रैल थीसिस कहा गया।
  • मजदूरों का आंदोलन गर्मियों में और फैलने लगा, उद्योगों में बनाई कमेटियों में मजदूरों ने मालिकों के बर्ताव पर सवाल उठाए। अंतरिम सरकार की ताकत कम होने लगी और बोल्शेविकों का दबदबा बढ़ा। ऐसे में सरकार ने आंदोलनों को दबाना शुरू कर दिया, और जुलाई 1917 में मजदूरों के दमन को रोका।
1917, अक्टूबर की क्रांति
  • लेनिन को सरकार के तानाशाह होने का खतरा लगा, सितंबर में सरकार के खिलाफ विद्रोह की तैयारी की गई।
  • बोल्शेविक पार्टी और पेत्रोग्राद सोवियत को लेनिन ने सत्ता पर कब्जा करने के लिए मना लिया। 24 अक्टूबर को यह विद्रोह शुरू कर दिया गया। सरकार के सैनिकों के बोल्शेविक अखबारों के दफ्तरों को घेर लिया। दोनों ओर के सैनिकों ने एक दूसरे की तरफ़ घेराबंदी करना शुरू कर दिया।
  • इस समय ऑरोरा नाम के युद्धपोत ने विंटर पैलेस पर बमबारी शुरू कर दी। शाम तक सरकार के मंत्रियों ने आत्मसमर्पण कर दिया।

अक्टूबर के बाद के बदलाव

  • निजी संपत्ति की समाप्ति, बैंको और उद्योगों का राष्ट्रीयकरण, जमीन को सामाजिक संपत्ति घोषित किया गया। किसानों को सामंतों की जमीन हथियाने की छूट।
  • बोल्शेविक पार्टी का नाम बदलकर, रूसी कम्युनिस्ट पार्टी कर दिया गया। 1917, नवंबर में चुनावों में इस पार्टी को बहुमत नहीं मिला, और जनवरी 1918 में असेंबली ने जब पार्टी के प्रस्तावों को खारिज किया, तब पार्टी ने असेंबली को बर्खास्त कर दिया।
  • मार्च 1918 में बोल्शेविक रूस में होने वाले चुनावों में एक ही पार्टी थी, यहाँ एक दलीय राजनीतिक व्यवस्था स्थापित हो गई।

गृह युद्ध

  • वे सभी रूसी सैनिक जो किसान भी थे, सरकार के जमीन पुनर्वितरण के निर्णय पर सेना छोड़कर जाने लगे। देश के अंदर बोल्शेविक (रेड्स), सामाजिक क्रांतिकारी (ग्रीनस) और जार के समर्थक (व्हाइट्स) नाम से तीन समूह बन गए।
  • ग्रीनस और व्हाइट्स को, ब्रिटिश, फ़्रांसीस और अमेरिकी समर्थन प्राप्त था, बोल्शेविक और इनके मध्य गृहयुद्ध, लूटमार, डकैती जैसी घटनाएं हुईं।
  • व्हाइट्स ने निजी संपत्तियों का प्रतिनधित्व किया जिससे जनता का समर्थन कम मिला। 1920 तक रूस पर बोल्शेविक नियंत्रण बढ़ गया था।

समाजवाद का निर्माण

  • बोल्शेविकों ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण जारी रखा, शासन के लिए केन्द्रीकृत नियोजन व्यवस्था लाई गई। पंचवर्षीय योजना लागू की गई। पहली पंचवर्षीय योजना (1927-32) में उद्योगों का विकास किया गया, और नए नए औद्योगिक शहर बने।
  • कम समय में अधिक काम करने के कारण मजदूरों को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा। शिक्षा व्यवस्था पर ध्यान दिया गया। मजदूरों को सारी सुविधाएं प्रदान की गईं।
सामूहिकीकरण का दौर
  • इस समय रूस में अनाज का भारी संकट था, नियोजित विकास के क्रम में सरकार द्वारा दी गई कीमत पर किसान अनाज बेचने पर राजी नहीं थे।
  • स्तालिन ने अब सत्ता की कमान संभाली, 1928 में अनाज के उत्पादन वाले इलाकों का दौरा किया गया। सम्पन्न किसानों जिन्होंने अनाज की जमाखोरी की हुई थी, के ठिकानों पर छापेमारी हुई।
  • इसके बाद भी अनाज की कमी होने पर बड़े खेतों में मशीनों द्वारा खेती शुरू की गई। यह था स्तालिन का समूहीकरण कार्यक्रम। किसानों को सामूहिक खेती करने के आदेश दिए गए।
  • किसानों ने इसका विरोध किया, और अपने मवेशियों को मार डाला, जिससे मवेशियों की संख्या में भारी कमी आई। समूहीकरण के बाद भी स्थिति बदली नहीं। 1930 से 33 के बीच सोवियत संघ में बड़ा आकाल पड़ा, जिसमें 40 लाख से ज्यादा लोग मारे गए।

रूसी क्रांति, वैश्विक प्रभाव और सोवियत संघ

  • दूसरे विश्व युद्ध के समय तक समाजवाद का प्रसार विश्व के कई देशों में हो गया था।
  • सोवियत संघ में अपनाई गई शासन शैली रूस से अलग थी। यह पिछड़ा हुआ देश अब विश्वशक्ति बन रहा था।
  • इसके बाद भी यहाँ नागरिकों को कई अधिकार प्रदान नहीं किए गए थे, और कई नीतियों को दबाव डालकर लागू किया गया।
  • देश में समाजवाद के आदर्शों का सम्मान था, लेकिन विश्व में इस देश की प्रतिष्ठा अब कम हो रही थी।
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