एनसीईआरटी समाधान कक्षा 10 इतिहास अध्याय 3 भूमंडलीकृत विश्व का बनना

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Ekta Ranga

आप इस आर्टिकल से कक्षा 10 इतिहास अध्याय 3 भूमंडलीकृत विश्व का बनना के प्रश्न उत्तर प्राप्त कर सकते हैं। भूमंडलीकृत विश्व का बनना के प्रश्न उत्तर परीक्षा की तैयारी करने में बहुत ही लाभदायक साबित होंगे। इन सभी प्रश्न उत्तर को सीबीएसई सिलेबस को ध्यान में रखकर बनाया गया है। कक्षा 10 इतिहास पाठ 3 के एनसीईआरटी समाधान से आप नोट्स भी तैयार कर सकते हैं, जिससे आप परीक्षा की तैयारी में सहायता ले सकते हैं। हमें बताने में बहुत ख़ुशी हो रही है कि यह सभी एनसीईआरटी समाधान पूरी तरह से मुफ्त हैं। छात्रों से किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जायेगा।

Ncert Solutions For Class 10 History Chapter 3 In Hindi Medium

हमने आपके लिए भूमंडलीकृत विश्व का बनना के प्रश्न उत्तर को संक्षेप में लिखा है। इन समाधान को बनाने में ‘राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद’ की सहायता ली गई है। भूमंडलीकृत विश्व का बनना पाठ बहुत ही रोचक है। इस अध्याय को आपको पढ़कर और समझकर बहुत ही अच्छा ज्ञान मिलेगा। आइये फिर नीचे कक्षा 10 इतिहास अध्याय 3 भूमंडलीकृत विश्व का बनना के प्रश्न उत्तर (Class 10 History Chapter 3 Question Answer In Hindi Medium) देखते हैं ।

संक्षेप में लिखें

प्रश्न 1 – सत्रहवीं सदी से पहले होने वाले आदान-प्रदान के दो उदाहरण दीजिए। एक उदाहरण एशिया से और एक उदाहरण अमेरिका महाद्वीपों के बारे में चुने।

उत्तर :- सत्रहवीं सदी से पहले होने वाले आदान-प्रदान के उदाहरण इस प्रकार है –

(क) एशिया – आधुनिक काल से पहले के युग में दुनिया के दूर-दूर स्थित भागों के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्कों का सबसे जीवंत उदाहरण सिल्क मार्गों के रूप में दिखाई देता है।

(ख) अमेरिका – अमेरिका में आलू, सोयाबीन, मूंगफली, मक्का, टमाटर मिर्च आदि चीजें पूरे विश्व में आदान-प्रदान की जाती थी। अमेरिका से सोना और चांदी जैसी धातुओं का भी आदान-प्रदान किया जाता था।

प्रश्न 2 – बताएं कि पूर्व– आधुनिक विश्व में बीमारियों के वैश्विक प्रसार ने अमेरिकी भूभागों के उपनिवेशीकरण में किस प्रकार मदद दी।

उत्तर :- सोलहवीं सदी से पहले तक तो अमेरिका देश को कोई अच्छे से जानता ही नहीं था। लेकिन सोलहवीं सदी के मध्य तक आते-आते पुर्तगाली और स्पेनिश सेनाओं की विजय का सिलसिला शुरू हो चुका था। उन्होंने अमेरिका को उपनिवेश बनाना शुरू कर दिया था। यूरोपीय सेनाएँ केवल अपनी सैनिक ताकत के दम पर नहीं जीती थीं। स्पेनिश विजेताओं के सबसे शक्तिशाली हथियारों में परंपरागत किस्म का सैनिक हथियार तो कोई था ही नहीं यह हथियार तो चेचक जैसे कीटाणु थे जो स्पेनिश सैनिकों और अफ़सरों के साथ वहाँ जा पहुँचे थे। लाखों साल से दुनिया से अलग-थलग रहने के कारण अमेरिका के लोगों के शरीर में यूरोप से आने वाली इन बीमारियों से बचने की रोग-प्रतिरोधी क्षमता नहीं थी। फलस्वरूप, इस नए स्थान पर चेचक बहुत मारक साबित हुई। एक बार संक्रमण शुरू होने के बाद तो यह बीमारी पूरे महाद्वीप में फैल गई। जहाँ यूरोपीय लोग नहीं पहुँचे थे वहाँ के लोग भी इसकी चपेट में आने लगे। इसने पूरे के पूरे समुदायों को खत्म कर डाला। इस तरह घुसपैठियों की जीत का रास्ता आसान होता चला गया।

प्रश्न 3 – निम्नलिखित के प्रभावों की व्याख्या करते हुए संक्षिप्त टिप्पणियां लिखे –

(क) कॉर्न लॉ के समाप्त करने के बारे में ब्रिटिश सरकार का फैसला।

उत्तर :- कॉर्न लॉ के समाप्त करने के बारे में ब्रिटिश सरकार का फैसला –

(1) जैसे ही काॅर्न लाॅ खत्म हुआ ठीक वैसे ही कम कीमत पर खाद्य पदार्थों का आयात होने लगा।

(2) आयातित खाद्य पदार्थों की लागत ब्रिटेन में पैदा होने वाले खाद्य पदार्थों से भी कम थी।

(3) इसके चलते ब्रिटिश किसानों की हालत बिगड़ने लगी क्योंकि वे आयातित माल की क़ीमत का मुक़ाबला नहीं कर सकते थे।

(4) विशाल भूभागों पर खेती बंद हो गई। हज़ारों लोग बेरोज़गार हो गए। गाँवों से उजड़ कर वे या तो शहरों में या दूसरे देशों में जाने लगे।

(ख) अफ्रीका में रिंडरपेस्ट का आना।

उत्तर :- अफ्रीका में रिंडरपेस्ट नाम की बीमारी सबसे पहले 1880 के दशक के आखिरी सालों में दिखाई दी। 1892 में यह अफ्रीका के अटलांटिक तट तक जा पहुँची। पाँच साल बाद यह केप (अफ्रीका का धुर दक्षिणी हिस्सा) तक भी पहुँच गई। रिंडरपेस्ट ने अपने रास्ते में आने वाले 90 प्रतिशत मवेशियों को मौत की नींद सुला दिया था। पशुओं के खत्म हो जाने से तो अफ्रीकियों के रोज़ी-रोटी के साधन ही खत्म हो गए। अपनी सत्ता को और मज़बूत करने तथा अफ्रीकियों को श्रम बाज़ार में ढकेलने के लिए वहाँ के बागान मालिकों, खान मालिकों और औपनिवेशिक सरकारों ने बचे-खुचे पशु भी अपने क़ब्ज़े में ले लिए। बचे-खुचे पशु संसाधनों पर क़ब्ज़े से यूरोपीय उपनिवेशकारों को पूरे अफ्रीका को जीतने व गुलाम बना लेने का बेहतरीन मौक़ा हाथ लग गया था।

(ग) विश्वयुद्ध के कारण यूरोप में कामकाजी उम्र के पुरुषों की मौत।

उत्तर :- प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान यूरोप में कामकाजी उम्र के पुरुषों की मौत हो गई थी। मृतकों और घायलों में से ज़्यादातर कामकाजी उम्र के लोग थे। इस महाविनाश के कारण यूरोप में कामकाज के लायक लोगों की संख्या बहुत कम रह गई। परिवार के सदस्य घट जाने से युद्ध के बाद परिवारों की आय भी गिर गई। युद्ध संबंधी सामग्री का उत्पादन करने के लिए उद्योगों का पुनर्गठन किया गया। युद्ध की ज़रूरतों के मद्देनजर पूरे के पूरे समाजों को बदल दिया गया। मर्द मोर्चे पर जाने लगे तो घर की महिलाओं को पुरूषों का कामकाज संभालना पड़ा।

(घ) भारतीय अर्थव्यवस्था पर महामंदी का प्रभाव।

उत्तर :- भारतीय अर्थव्यवस्था पर महामंदी का प्रभाव कुछ इस तरह पड़ा –

(1) 1928 से 1934 के बीच देश के आयात-निर्यात घट कर लगभग आधे रह गए थे। जब अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कीमतें गिरने लगीं तो यहाँ भी कीमतें नीचे आ गई। 1928 से 1934 के बीच भारत में गेहूं की कीमत 50 प्रतिशत गिर गई।

(2) शहरी निवासियों के मुकाबले किसानों और काश्तकारों को ज्यादा नुकसान हुआ यद्यपि कृषि उत्पादों की कीमत तेजी से नीचे गिरी लेकिन सरकार ने लगान वसूली में छूट देने से साफ़ इनकार कर दिया। सबसे बुरी मार उन काश्तकारों पर पड़ी जो विश्व बाजार के लिए उपज पैदा करते थे।

(3) सभी किसानों को कर्ज ने बुरी तरह से प्रभावित किया।

(4) 1931 में मंदी अपने चरम पर थी और ग्रामीण भारत असंतोष व उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था। उसी समस महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा (सिविल नाकरमानी) आंदोलन शुरू किया।

(5) मंदी ने शहरी भारत के लिए इतनी परेशानी खड़ी नहीं की। कीमतें गिरते जाने के बावजूद शहरों में रहने वाले ऐसे लोगों की हालत ठीक रही जिनकी आय निश्चित थी।

(ड) बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा अपने उत्पादन को एशियाई देशों में स्थानांतरित करने का फैसला।

उत्तर :- बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा अपने उत्पादन को एशियाई देशों में स्थानांतरित करने से बहुत फायदा मिला। इन कंपनियों को एशिया में सस्ते में मजदूर उपलब्ध हो जाते थे। ऐसा होने से विश्व के व्यापार को बहुत फायदा पहुंचा। विश्व में जो मंदी चल रही थी उसमें सकारात्मक रूप से उछाल आया। उद्योगों को कम वेतन वाले देशों में ले जाने से वैश्विक व्यापार और पूंजी प्रवाहों पर भी असर पड़ा।

प्रश्न 4 – खाद्य उपलब्धता तक तकनीक के प्रभाव को दर्शाने के लिए इतिहास से दो उदाहरण दें।

उत्तर :- खाद्य उपलब्धता तक तकनीक के प्रभाव को दर्शाने के लिए इतिहास से दो उदाहरण हैं –

(1) औपनिवेशीकरण ने बहुत सी चीजें आसान कर दी थी। उदाहरण के लिए हम यातायात के साधनों की बात कर सकते हैं। रेलगाड़ियां सरपट पटरी पर दौड़ने लगी। जलपोतों का आकार बढ़ गया। बोगियों का भार कम होने से भी बहुत फायदा पहुंचा।

(2) पानी के जहाजों से जितने भी खाद्य पदार्थ ले जाया करते थे वह पहले जल्दी ही खराब हो जाया करते थे। लेकिन जैसे ही जहाजों में रेफ्रिजरेशन की तकनीक विकसित हुई वैसे ही खाद्य पदार्थों को बिना कोई दिक्कत के लंबी दूरी के लिए भी ले जाया जाने लगा।

प्रश्न 5 – ब्रेटन वुड्स समझौते का क्या अर्थ है।

उत्तर :- यह हम सभी को ही पता है कि विश्वयुद्ध के बाद पूरी दुनिया उथल-पुथल हो गई थी। ऐसे में यह जरूरी हो गया था कि विश्व बाजार में आर्थिक स्थिरता और रोजगार बना रहे। इसी लक्ष्य को हासिल करने हेतु 1944 में अमेरिका स्थित न्यू हैम्पशर के ब्रेटन वुड्स नामक स्थान पर संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक एवं वित्तीय सम्मेलन में सहमति तय हुई थी। सदस्य देशों के विदेश व्यापार में लाभ और घाटे से निपटने के लिए ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.) की स्थापना की गई। युद्धोत्तर पुनर्निर्माण के लिए पैसे का इंतज़ाम करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (जिसे आम बोलचाल में विश्व बैंक कहा जाता है) का गठन किया गया। विश्व बैंक और आई.एम.एफ़. को ब्रेटन वुड्स संस्थान या ब्रेटन वुड्स ट्विन (ब्रेटन वुड्स की जुड़वाँ संतान) भी कहा जाता है। इसी आधार पर युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को अकसर ब्रेटन वुड्स व्यवस्था भी कहा जाता है।

चर्चा करें

प्रश्न 6 – कल्पना कीजिए कि आप कैरीबियाई क्षेत्र में काम करने वाले गिरमिटिया मजदूर हैं। इस अध्याय में दिए गए विवरणों के आधार पर अपने हालात और अपनी भावनाओं का वर्णन करते हुए अपने परिवार के नाम एक पत्र लिखें।

उत्तर :- चैतन्य,

प्यारे पिताजी,

मुझे यह खत लिखते हुए बहुत खुशी हो रही है। आखिर इतने दिनों बाद मैं आपको अपने दिल की बात बता पा रहा हूं। आपको यह जानकर बहुत दुख हुआ होगा कि मेरा जबरन अपहरण किया गया। मुझे एक ऐसी जगह लाया गया है जिसके बारे में मैं अभी ठीक से जानता नहीं हूं। बस मेरे जैसे ही अन्य और मजदूर इस जगह को फिजी कहते हैं। यहां हालात बहुत अलग है। यहां की जीवन और कार्य स्थितियां बहुत कठोर है। मुझे यहां का माहौल देखकर बहुत अजीब लगा। यहां का जीवन एक आम घरेलू नौकर के जीवन से कई गुना खराब है। एक दिन तो मैं मौका देखकर वहां से भाग निकला था। लेकिन मुझे फिर से पकड़कर यहां ले आएं। मुझे घर की बहुत याद आती है। आशा करता हूं कि आप सब ठीक होंगे। उम्मीद यही है कि मैं जल्द से जल्द वापिस अपने घर लौट आऊंगा।

आपका बेटा,
चैतन्य

प्रश्न 7 – अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमयों में तीन तरह की गतियों या प्रवाहों की व्याख्या करें। तीनों प्रकार की गतियों के भारत और भारतीयों से संबंधित एक– एक उदाहरण दे और उनके बारे में संक्षेप में लिखें।

उत्तर :- अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमयों में तीन तरह की गति या प्रवाह है – श्रम, व्यापार और पूंजी।

श्रम भारत के मजदूरों को कई देशों में काम के लिए ले जाया करता था। हमारे देश के कितने ही मजदूर अपने देश को छोड़कर सड़क, रेलवे परियोजना, खदानों आदि में काम करने को मजबूर थे। विदेशियों को हमारे देश के मजदूर सस्ते वेतन पर उपलब्ध हो जाते थे।

व्यापार – हमारे देश से सामान बाहर जाते थे। और बाहर से भी कई सामान हमारे देश में आते थे। हमारे देश से कपड़े, मसाले और गेंहू जैसी चीजें निर्यात की जाती थी।

पूंजी – भारत के व्यापारी विदेशों में निवेश किया करते थे। और विदेशी व्यापारी भी भारत में आकर निवेश करते थे। ऐसे में पूंजी में लेन देन होती थी।

प्रश्न 8 – महामंदी के कारणों की व्याख्या करें।

उत्तर :- पहला कारण – महामंदी के समय सबसे पहला कारण था कि किसानों ने कृषि की अधिक पैदावार कर दी थी। उस समय कृषि उत्पादों की कीमतें बहुत हद तक गिर गई थी। इससे किसानों की आय पर भी बहुत ज्यादा बुरा असर पड़ा। किसानों ने सोचा कि आय बढ़ाने का सबसे अच्छा स्तोत्र हो सकता है कृषि उत्पादन अधिक बढ़ाना। लेकिन यह उपाय कारगर साबित नहीं हुआ। कृषि उत्पादों की आमद और भी बढ़ गई। जाहिर है, कीमतें और नीचे चली गई। खरीदारों के अभाव में कृषि उपज पड़ी पड़ी सड़ने लगी।

दूसरा कारण – 1920 के दशक के मध्य में बहुत सारे देशों ने अमेरिका से क़र्ज़े लेकर अपनी निवेश संबंधी जरूरतों को पूरा किया था। जब हालात अच्छे थे तो अमेरिका से कुर्जा जुटाना बहुत आसान था लेकिन संकट का संकेत मिलते ही अमेरिकी उद्यमियों के होश उड़ गए। 1928 के पहले छह माह तक विदेशों में अमेरिका का क़र्जा एक अरब डॉलर था। साल भर के भीतर यह कर्जा घटकर केवल चौथाई रह गया था। जो देश अमेरिकी क़र्ज़े पर सबसे ज्यादा निर्भर थे उनके सामने गहरा संकट आ खड़ा हुआ।

प्रश्न 9 – जी-77 देशों से आप क्या समझते हैं। जी– 77 को किस आधार पर ब्रेटन वुड्स की जुड़वा संतानों की प्रतिक्रिया कहा जा सकता है। व्याख्या करें।

उत्तर :- दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने के बाद भी दुनिया का एक बहुत बड़ा भाग यूरोपीय औपनिवेशिक शासन के अधीन था। अगले दो दशकों में एशिया और अफ़्रीका के ज़्यादातर उपनिवेश स्वतंत्र, स्वाधीन राष्ट्र बन चुके थे। लेकिन ये सभी देश गरीबी व संसाधनों की कमी से जूझ रहे थे। उनकी अर्थव्यवस्थाएँ और समाज लंबे समय तक चले औपनिवेशिक शासन के कारण अस्त-व्यस्त हो चुके थे। आई.एम.एफ. और विश्व बैंक का गठन तो औद्योगिक देशों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ही किया गया था। ये संस्थान भूतपूर्व उपनिवेशों में गरीबी की समस्या और विकास की कमी से निपटने में दक्ष नहीं थे। पचास के दशक के आखिरी सालों में आकर ब्रेटन संस्थान विकासशील देशों पर भी पहले से ज्यादा ध्यान देने लगे। ज्यादातर विकासशील देशों को पचास और साठ के दशक में पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं को तेज प्रगति से कोई लाभ नहीं हुआ। इस समस्या को देखते हुए उन्होंने एक नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली (New International Economic Order NIEO) के लिए आवाज उठाई और समूह 77 (जी-77) के रूप में संगठित हो गए।

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