Class 11 Political Science Book-1 Ch-4 “सामाजिक न्याय” Notes In Hindi

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Navya Aggarwal

इस लेख में छात्रों को एनसीईआरटी 11वीं कक्षा की राजनीति विज्ञान की पुस्तक-1 यानी “राजनीतिक सिद्धांत” के अध्याय- 4 “सामाजिक न्याय” के नोट्स दिए गए हैं। विद्यार्थी इन नोट्स के आधार पर अपनी परीक्षा की तैयारी को सुदृढ़ रूप प्रदान कर सकेंगे। छात्रों के लिए नोट्स बनाना सरल काम नहीं है, इसलिए विद्यार्थियों का काम थोड़ा सरल करने के लिए हमने इस अध्याय के क्रमानुसार नोट्स तैयार कर दिए हैं। छात्र अध्याय 4 राजनीति विज्ञान के नोट्स यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

Class 11 Political Science Book-1 Chapter-4 Notes In Hindi

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अध्याय- 4 “सामाजिक न्याय”

बोर्डसीबीएसई (CBSE)
पुस्तक स्रोतएनसीईआरटी (NCERT)
कक्षाग्यारहवीं (11वीं)
विषयराजनीति विज्ञान
पाठ्यपुस्तकराजनीतिक सिद्धांत
अध्याय नंबरचार (4)
अध्याय का नामसामाजिक न्याय
केटेगरीनोट्स
भाषाहिंदी
माध्यम व प्रारूपऑनलाइन (लेख)
ऑफलाइन (पीडीएफ)
कक्षा- 11वीं
विषय- राजनीति विज्ञान
पुस्तक- राजनीतिक सिद्धांत
अध्याय-4 “सामाजिक न्याय”

न्याय क्या है?

  • प्राचीन भारत में न्याय का संबंध धर्म के साथ जोड़ा जाता था, जहां राजा का धर्म होता था कि वह समाज में धर्म और न्याय कायम करे।
  • चीन के कन्फ्यूशस का मानना था कि न्याय की स्थापना करने के लिए राजा को गलत करने वालों को दंडित और सही करने वालों को पुरस्कृत करना चाहिए।
  • प्लेटो ने भी अपनी पुस्तक द रिपब्लिक में न्याय पर चर्चा की है। सुकरात ने भी कुछ युवाओं के प्रश्नों का जवाब देते हुए कहा है कि यदि सभी अन्यायी हो जाएंगे, तो अन्याय से होने वाला लाभ भी कम ही हो जाएगा, और सुरक्षा को खतरा बढ़ेगा। इसलिए न्याय का साथ देना जरूरी है, यह दीर्घकालिक हितों की रक्षा का करता है।
  • जर्मन के दार्शनिक इमैनुअल कांट ने व्यक्तियों को उचित बराबरी देने की बात को अहमियत दी है, जो कि न्याय के लिए आवश्यक है।

न्याय के विभिन्न सिद्धांत

समान लोगों के साथ समान बर्ताव

  • मनुष्यों में कुछ समान विशेषताएं होती हैं, जिसके कारण वे समान बर्ताव के अधिकारी बन जाते हैं। इन अधिकारों में जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति आदि के अधिकार आ जाते हैं।
  • इसके साथ ही लोगों के साथ धर्म, रंग, नस्ल आदि के आधार पर भेदभाव न किया जाए। धर्म या किसी भी अन्य भिन्नता के कारण यदि दो लोगों के साथ असमान बर्ताव किया जा रहा है, तो यह अन्यायपूर्ण है।

समानुपातिक न्याय

  • जब राज्य के सभी नागरिकों को एक ही मानदंड देने के बाद भी उनका मापन केवल उनके प्रयासों और आहर्ता के आधार पर किया जाए तब यहाँ न्याय होगा।
  • अर्थात, समान काम वालों के लिए समान वेतन होना अनिवार्य है, लेकिन काम में भिन्न कौशल, पद के आधार पर भिन्न वेतन भी दिया जा सकता है।
  • इसे ही समाज में समान बरताव और समानुपातिक न्याय के बीच में संतुलन की स्थिति कहा जाएगा।

विशेष आवश्यकताओं का विशेष ख्याल

  • इसमें नागरिकों की आवश्यकताओं के आधार पर परिश्रम के वितरण को रखा जाता है, जो सामाजिक न्याय को बढ़ावा भी देता है।
  • ऐसे लोग सामान्य लोगों से भिन्न हैं, जैसे- विकलांग जन, इन लोगों को कुछ खास मामलों में विशेष सहायता प्रदान की जानी चाहिए।
  • इसमें भी कौन सी असमानता को विशेष सहायता दी जाए, इस पर विवाद रहता है।
  • भारत में शिक्षा के अच्छे स्तर पर पहुँचने और अन्य सुविधाओं के न मिल पाने के पीछे जातिगत भेदभाव होते हैं। यही कारण है कि इन जातियों के लिए संविधान में आरक्षण का प्रावधान दिया जाता है।
  • सरकार इन तीनों सिद्धांतों के बीच सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाती।
  • देश में व्याप्त विभिन्न समूह, अलग नीतियों का समर्थन करते हैं, जिससे यह पता चलता है कि वे न्याय कौन से सिद्धांत पर बल देंगे। सरकार ही न्याय की स्थापना करने के लिए इन सिद्धांतों के बीच सामंजस्य स्थापित कर सकती है।

न्यायपूर्ण बंटवारा

  • कानून तथा नीतियों का निष्पक्ष वितरण सभी व्यक्तियों पर करना सरकार की जिम्मेदारी है, सामाजिक न्याय के अंतर्गत वरतुओं और सेवाओं का वितरण भी सम्मिलित है। यह वितरण छोटे और बड़े स्तर पर हो सकता है।
  • देश में सामाजिक न्याय में यह आवश्यक है कि कानून और नीति के साथ-साथ स्थितियों और अवसरों के मामलों में भी समानता दी जानी चाहिए।
  • व्यक्ति के लिए अभिव्यक्ति बेहद आवश्यक है। जैसे संविधान के तहत निचली जातियों को रोजगार के समान अवसर, और महत्वपूर्ण संसाधनों के उचित बंटवारे के लिए सरकार द्वारा भूमि-सुधार कानून लागू किया गया।
  • समान वितरण के प्रश्नों पर सवाल आने पर भिन्न मतों के कारण मतभेद उत्पन्न होने लगते हैं, इस तरह के मुद्दे आरक्षण लागू होने के समय में देश में भड़की हिंसा के रूप में याद किए जा सकते हैं।

न्याय सिद्धांत: जॉन रॉल्स

  • रॉल्स के अनुसार निष्पक्ष और न्यायसंगत नियम बनाने के लिए व्यक्ति को खुद को उस परिस्थिति में ढालने की आवश्यकता होती है, कि समाज का संगठन किस प्रकार होता है।
  • जब हम समाज में हमारी आने वाली स्थिति से अवगत नहीं होते, तब हमारे द्वारा लिए गए निर्णय का असर समाज के सदस्यों के लिए अच्छा होगा।
  • रॉल्स इसे अज्ञानता के आवरण में सोचना कहते हैं। उनका मानना है कि अपने भविष्य की अज्ञानता के कारण व्यक्ति को अपने हितों को ध्यान में रखकर फैसला करना होता है।
  • रॉल्स कहते हैं कि व्यक्ति को यह पता होने के बाद भी कि वे सुविधा सम्पन्न है या नहीं, उन्हें अपने निर्णयों के आधार पर निम्न वर्गों को लिए भी अवसरों को सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए।
  • इस प्रकार से सोचना आसान नहीं है, इसलिए अक्सर आत्म त्याग को वीरता से जोड़कर देखा जाता है।
  • अज्ञानता के आवरण के तहत लोगों से विवेकी होने की उम्मीद रहती है, और वे यह भी देखेंगे कि उनके लिए बुरी स्थिति में सोचना ज्यादा हितकर साबित होता है।
  • उचित कानून और नीतियों तक पहुँचने के लिए अज्ञानता का यह आवरण पहला कदम ही है, इससे वे सभी बुरे संदर्भों को परख पाएंगे और नीति निर्माण कर पाएंगे।
  • रॉल्स का कहना है कि नैतिकता के विपरीत विवेकशीलता के द्वारा हम लाभ और भार का निष्पक्ष वितरण समाज में कर सकते हैं।

सामाजिक न्याय और उसका अनुसरण

  • जिस समाज में अपार धन-दौलत होने के बाद भी वंचितों और सुविधासम्पन्न लोगों के बीच विभाजन की स्थिति है, वहां सामाजिक न्याय नहीं हो सकता। न्याय के लिए केवल रहन-सहन में एकरूपता या भिन्नता का होना आवश्यक नहीं है।
  • परंतु ऐसा समाज जहां वंचित वर्गों को समानता के अवसर ही प्राप्त न हों, वह समाज अन्यायपूर्ण कहलाएगा।
  • न्यूनतम बुनियादी आवश्यकताएं- आवश्यक पोषण की निश्चित मात्रा, शिक्षा, पेयजल, आवास, न्यूनतम मजदूरी, इसके अंतर्गत विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जोड़े गए हैं।
  • इन जरूरतों को देश की सरकार द्वारा पूरा किया जाता है। भारत जैसे देश में सरकारों के लिए जिम्मेदारी बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य हो गया है।
  • इस तरह के लक्ष्यों को पाने के तरीकों को लेकर ही मतभेद उत्पन्न होने लगते हैं। इस बात पर भी मतभेद रहते हैं, कि सरकार इस जिम्मेदारी को उठाए या मुक्त व्यापार की नीति द्वारा सुविधा सम्पन्न वर्ग को नुकसान पहुँचाए बिना बाजार में प्रतियोगिता को बढ़ावा दिया जाए।

मुक्त बाजार और राज्य सरकार

  • मुक्त बाजार समर्थक यह मानते हैं कि संपत्ति अर्जित करने, मूल्य और मजदूरी निर्धारित करने के लिए मनुष्य को स्वतंत्र होने की आवश्यकता है।
  • इसमें राज्य का यदि हस्तक्षेप न हो तो इससे समाज में लाभ और कर्तव्यों का न्यायपूर्ण वितरण सरल हो जाएगा, जो केवल योग्य वर्ग को लाभ अर्जन का मौका देगा जिससे बाजारों का वितरण न्याय पर आधारित होगा।
  • आज के समय में राज्यों का हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है, इससे नागरिक समान शर्तों पर प्रतिस्पर्धा कर पाते हैं।
  • मुक्त बाजार के द्वारा न्यायपूर्ण समाज उत्पन्न किया जा सकता है, जहां जाति और धर्म की चिंता न की जाए, जहां मानव का कौशल ही उसकी पहचान बन सकता है।
  • इससे हमारे पास विकल्प खुल जाते हैं, जिसके लिए हमारे पास संसाधनों का होना आवश्यक हो जाता है। निजी एजेंसियां इस बुनियादी सुविधाओं के लिए बाजार का हिस्सा नहीं बनेगीं।
  • निजी एजेंसियों की सेवाएं सरकारी संस्थाओं की तुलना में अधिक गुणवत्ता पूर्ण एवं महंगी होतीं हैं, जो गरीब वर्ग तक पहुँच पाना मुश्किल है। यही कारण है कि मुक्त व्यापार ताकतवर और अमीर वर्ग के हितों को साधता है।
  • बाजार का संबंध सुविधा सम्पन्न नागरिकों से है, और सामाजिक न्याय स्थापित करने के लिए सरकार को सभी नागरिकों को सुविधाएं मुहैया करानी होंगी।
  • वितरण और न्याय के मुद्दों पर बनने वाली असहमतियाँ आवश्यक हैं, इससे जांच-परख की क्षमता का विकास होता है।
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