Class 11 Political Science Book-2 Ch-5 “विधायिका” Notes In Hindi

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Navya Aggarwal

इस लेख में छात्रों को एनसीईआरटी 11वीं कक्षा की राजनीति विज्ञान की पुस्तक-2 यानी “भारत का संविधान-सिद्धांत और व्यवहार” के अध्याय-5 “विधायिका” के नोट्स दिए गए हैं। विद्यार्थी इन नोट्स के आधार पर अपनी परीक्षा की तैयारी को सुदृढ़ रूप प्रदान कर सकेंगे। छात्रों के लिए नोट्स बनाना सरल काम नहीं है, इसलिए विद्यार्थियों का काम थोड़ा सरल करने के लिए हमने इस अध्याय के क्रमानुसार नोट्स तैयार कर दिए हैं। छात्र अध्याय 5 राजनीति विज्ञान के नोट्स यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

Class 11 Political Science Book-2 Chapter-5 Notes In Hindi

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अध्याय- 5 “विधायिका”

बोर्डसीबीएसई (CBSE)
पुस्तक स्रोतएनसीईआरटी (NCERT)
कक्षाग्यारहवीं (11वीं)
विषयराजनीति विज्ञान
पाठ्यपुस्तकभारत का संविधान- सिद्धांत और व्यवहार
अध्याय नंबरपाँच (5)
अध्याय का नामविधायिका
केटेगरीनोट्स
भाषाहिंदी
माध्यम व प्रारूपऑनलाइन (लेख)
ऑफलाइन (पीडीएफ)
कक्षा- 11वीं
विषय- राजनीति विज्ञान
पुस्तक- भारत का संविधान- सिद्धांत और व्यवहार
अध्याय-5 “विधायिका”

विधायिका का महत्त्व

  • विधायिका का निर्वाचन जनता द्वारा किया जाता है, और इसका कार्य भी जनता का प्रतिनिधित्व करना ही है।
  • कानून बनाना इसके महत्त्वपूर्ण कार्यों में से एक है। संसद में कार्य के लिए बहस, सरोकार, विरोध प्रदर्शन, सहयोग आदि इसके अस्तित्व को जीवित रखने का काम करते हैं।
  • इससे जनप्रतिनिधि जनता के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को सुनिश्चित करते हैं। लेकिन आज के समय में कई लोकतान्त्रिक देशों में कार्यपालिका के कारण विधायिकाओं का महत्त्व कम होता जा रहा है।
  • भारत में अक्सर नीति निर्माण की पहल मंत्रिमण्डल द्वारा की जाती है। लेकिन इसके बाद भी बड़े से बड़े राजनेता को भी संसद में बहुमत हासिल करने की आवश्यकता होती है। इससे संसद के लोकतान्त्रिक महत्त्व का पता चलता है।
  • विधायिका के पास कार्यपालिका को चुनने और बर्खास्त करने की शक्तियां भी हैं।

संसद में सदन

  • भारत में द्वि-सदनात्मक विधायिका है। राज्यों के सदन को विधान मण्डल के नाम से जाना जाता है।
  • इनमें से एक सदन ‘राज्यसभा’ और दूसरा ‘लोकसभा’ कहलाता है। राज्यों के विधानमंडलों में एक या दो सदन हो सकते हैं, भारत में 6 राज्यों में विधानमण्डल हैं।
  • द्वि-सदनात्मक व्यवस्था द्वारा देश के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व आसान हो जाता है, और एक सदन में लिए गए निर्णय का पुनर्विचार दूसरे सदन में किया जाना संभव है।

राज्यसभा

  • राज्य का प्रतिनिधित्व राज्यसभा करता है, इसका निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से किया जा सकता है यानी राज्य विधानसभा के चयनित सदस्य राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव करते हैं।
  • राज्यसभा प्रतिनिधित्व के दो सिद्धांत- असमान क्षेत्रों और जंसख्या को राज्य सभा में समान प्रतिनिधित्व दिया जाए, जैसे अमेरिका के सीनेट में प्रत्येक राज्य को समान प्रतिनिधित्व प्राप्त है।
  • या जनसंख्या के आधार पर असमान प्रतिनिधित्व प्रदान कर दिया जाए। इससे ज्यादा जनसंख्या वाले क्षेत्रों को अधिक और कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों को कम प्रतिनिधित्व प्राप्त होगा। जैसे भारत में संविधान की चौथी अनुसूची के आधार पर निर्वाचित होने वाले सदस्यों की संख्या का निर्धारण राज्यों में अलग-अलग है।
  • भारत में समान प्रतिनिधित्व की प्रणाली को नहीं अपनाया जा सकता, क्योंकि उत्तर प्रदेश की जनसंख्या और सिक्किम की जनसंख्या को समान प्रतिनिधित्व देना विसंगतियों को जन्म दे सकता था।
राज्यसभा: संरचना
  • राज्यसभा को संसद के स्थायी सदन के रूप में जाना जाता है, क्योंकि इसका कार्यकाल पूर्ण रूप से भंग नहीं किया जा सकता।
  • इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है, और हर 2 वर्ष में एक तिहाई सदस्य ही अपना कार्यकाल पूरा करते हैं। इसलिए राज्यसभा का चुनाव एक तिहाई सीट के लिए होता है।
  • इससे लोकसभा के भंग होने पर बचे हुए कार्य यहां कर लिए जाते हैं। इसमें 12 मनोनीत सदस्यों को भी रखा जाता है, जो साहित्य, खेल, विज्ञान आदि में उपलब्धि हासिल करने के कारण सदस्य बनाए जाते हैं।

लोकसभा

  • देश की जनता प्रत्यक्ष रूप से लोकसभा के सदस्यों का चुनाव करती है। राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों का चुनाव भी जनता द्वारा ही किया जाता है।
  • लोकसभा के चुनावों में पूरे देश को एक निर्वाचन क्षेत्र के रूप में देखा जाता है, जिसमें 543 सीटें शामिल हैं। ऐसे ही विधानसभा चुनावों में राज्य का बंटवारा निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर कर दिया जाता है।
  • लोकसभा के चुनाव वयस्क मताधिकार द्वारा होते हैं, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति का एक वोट होता है।
  • इन चुनावों से सदस्यों का चयन 5 वर्ष के लिए होता है, जो किसी विशेष स्थिति में 5 वर्ष से पहले भंग भी किया जा सकता है।
राज्यसभा और लोकसभा की शक्तियां
लोकसभा की शक्तियांराज्यसभा की शक्तियां
संघ और समवर्ती सूची पर कानून बनाना, धन और सामान्य विधेयक को प्रस्तुत कर पारित करना। सामान्य विधेयकों पर विचार कर उन्हें पारित करना और धन विधेयकों में संशोधन प्रस्तावित करती है।
प्रश्न पूछकर, पूरक प्रश्न पूछकर प्रस्ताव लाकर और अविश्वास प्रस्ताव से कार्यपालिका को नियंत्रित करना। संवैधानिक संशोधनों को पारित करती है।
कर प्रस्तावों, बजट और वार्षिक वित्तीय वक्तव्यों को स्वीकृति देना।प्रश्न पूछ कर तथा संकल्प और प्रस्ताव प्रस्तुत करके कार्यपालिका पर नियंत्रण करती है।
संविधान संशोधन राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव में भागीदारी करती है तथा उन्हें और सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटा सकती है। उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव केवल राज्य सभा में ही लाया जा सकता है।
आपातकाल की घोषणा को स्वीकृति देना। यह संसद को राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार दे सकती है।
राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चयन या अपदस्थ कर सकती है, और सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालय के न्यायधीशों को हटा सकती है।
समिति और आयोगों का गठन और प्रतिवेदनों पर विचार।
विशेष शक्तियां

लोकसभा

  • यहाँ पर ही धन-विधेयक प्रस्तुत किए जा सकते हैं और इन्हें अस्वीकृति या संशोधित करना भी लोकसभा का ही काम है।
  • मंत्रीपरिषद् का उत्तरदायित्व केवल लोकसभा की ओर ही होता है, राज्यसभा की ओर नहीं।

राज्यसभा

  • राज्य के हितों से संबंधित हर मुद्दे पर राज्य सभा की स्वीकृति होना आवश्यक है।
  • जैसे यदि केंद्र सरकार राज्य सूची का कोई विषय अन्य किसी भी सूची में डालना चाहे, तो राज्यसभा की अनुमति अनिवार्य है।

संसद के कार्य

  • विधायी कामकाज– देश में नियमों को लागू करने के लिए संसद का काम कानून बनाने का है, लेकिन इसके बाद भी इसका महत्त्वपूर्ण कार्य मात्र स्वीकृति देना ही रह जाता है।
  • कार्यपालिका पर नियंत्रण और उनके उत्तरदायित्वों को सुनिश्चित करना– यह कार्यपालिका यानी जनता ने जिन सदस्यों का चुनाव किया है, के जनता के प्रति उत्तरदायित्वों को सुनिश्चित करती है।
  • वित्त संबंधी कार्य– लोकतान्त्रिक सरकार के धन के प्रयोग पर नियंत्रण का कार्य संसद करती है। जैसे यदि भारत सरकार कोई प्रस्ताव लाती है, तो संसद उस प्रस्ताव के धन की उपलब्धता सुनिश्चित कराती है। सरकार के वार्षिक खर्चों का संसद वार्षिक बजट के हिसाब से प्रबंधन करती है।
  • प्रतिनिधित्व– यह देश के विविध विचारों को प्रतिनिधित्व प्रदान करता है।
  • बहस का मंच– यह सदन के सदस्यों को अपने विचार रखने के लिए स्वतंत्र मंच प्रदान करता है। किसी भी विषय पर राष्ट्र के सामने सदस्यों के बीच वाद-विवाद और विश्लेषण किया जाता है।
  • संवैधानिक कार्य– संसद के दोनों सदनों के पास एक समान संविधान संशोधन की शक्तियां हैं।
  • निर्वाचन कार्य– भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव।
  • न्यायिक कार्य– इसमें राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति तथा न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाए जाने संबंधी कार्य सम्मिलित हैं।

संसद के कानून निर्माण संबंधी कार्य

  • जनता के लिए कानून बनाना इसके प्रमुख कार्यों में से एक है। कानून बनाने की कुछ विधियाँ संविधान में दी गई हैं, और कुछ कालक्रम से चली आ रही हैं।
  • पारित होने से पूर्व प्रस्ताव को विधेयक कहा जाता है। यदि विधेयक मंत्री पेश करे, तो ‘सरकारी विधेयक’ नहीं तो ‘निजी सदस्यों का विधेयक’ कहलाता है।
  • सर्वप्रथम, विधेयक की आवश्यकता पर चर्चा, और कानून बनने पर इसके लिए संसाधनों को कैसे बटोरा जाएगा और कानून को जनता का समर्थ प्राप्त होगा या नहीं इत्यादि पर चर्चा की जाती है।
  • विधेयक का प्रारूप तैयार किया जाता है। संबंधित मंत्रिमंडल ही इसका प्रारूप बनाता है। जैसे महिला संबंधी कानून के लिए, महिला और बाल विकास मंत्रालय ही प्रारूप तैयार करेगा।
  • इसकी पेशगी (धन विधेयक को छोड़कर) दोनों सदनों में की जा सकती है। विधेयक पर विचार विमर्श कर समितियाँ संसद के दोनों सदनों में चर्चा के लिए अपनी सिफारिशों को भेजती हैं। इन समितियों को लघु विधायिका भी कहा जाता है।
  • अंतिम चरण में विधेयक पर मतदान करवाया जाता है, एक सदन में पारित होने के बाद दूसरे सदन में भेज दिया जाता है, यदि दोनों में से किसी भी एक सदन में प्रस्ताव पर मतभेद होता है, इस स्थिति में संयुक्त अधिवेशन के द्वारा इसे सुलझाया जाता है।
  • धन-विधेयक के मामले में या तो राज्यसभा उसे मंजूरी देगी या फिर प्रस्तावित करेगी, राज्यसभा उसे अस्वीकार नहीं कर सकती।
  • संसद के दोनों सदनों की मंजूरी के बाद विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाता है, जिसके बाद विधेयक कानून बनता है।

संसद और कार्यपालिका का नियंत्रण

  • संसद के द्वारा कार्यपालिका पर नियंत्रण रखा जाता है, इसके लिए संसद का सचेत और सक्रिय होना आवश्यक है।
  • इसके लिए संसद और विधायकों का स्वतंत्र होना आवश्यक है, जैसे विधायिका में सदस्यों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की जाती। यदि इस विशेषाधिकार का हनन होता है, तो इस स्थिति में विधायिका के अध्यक्ष का निर्णय ही अंतिम होता है।
  • इससे विधायिका के सदस्य जनता के प्रतिनिधित्व के लिए कार्य कर सकें और कार्यपालिका पर नियंत्रण रख सकें।
संसदीय नियंत्रण के साधान
  • बहस और चर्चा द्वारा- विधायिका कार्यपालिका द्वारा बनाई गई नीतियों पर बहस करती है। इसके अलावा प्रश्नकाल में सदस्यों द्वारा मंत्रियों से प्रश्न किये जाते हैं, और शून्यकाल में सदस्य महत्त्वपूर्ण मुद्दे उठाते हैं, जिनपर मंत्रियों का जवाब देना आवश्यक नहीं होता।
  • कानून की स्वीकृति या अस्वीकृति द्वारा– कार्यपालिका के किसी कानून को मंजूर करने और नामंजूर करने का अधिकार भी विधायिका के पास होता है।
  • वित्तीय नियंत्रण और अविश्वास प्रस्ताव द्वारा- सरकार की नीतियों का बजट विधायिका द्वारा ही निर्धारित किया जाता है। संसाधनों की उपलब्धता के लिए विधायिका कार्यपालिका को मना भी कर सकती है।
  • गठबंधन की सरकार होने की स्थिति में सदन सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव से कार्यपालिका पर नियंत्रण कर सकता है। लेकिन बहुमत के समय यह कर पाना संभव नहीं है।

संसदीय समितियों के कार्य

  • संसदीय कार्यों के लिए समितियों का गठन किया जाता है, जो कानून बनाने के साथ-साथ सदन के अन्य काम भी करती हैं।
  • समितियों का कार्य है, विधेयकों का अध्ययन करना, विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान मांगों का अध्ययन, विभागों के खर्चों की जांच, भ्रष्टाचार के मामलों की जांच इत्यादि।
  • भारत के संसद में 1983 से स्थायी समितियों की स्थापना की गई थी, इसके अलावा देश में संयुक्त समितियों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। इनका निर्माण वित्तीय अनियमितताओं की जांच आदि करने के लिए किया जाता है।
  • समितियों ने सदन के कार्यभार को कम करने का काम किया है। विधेयक पर संसद समितियों द्वारा दिए गए सुझाव को संसद मंजूर कर लेती है।

संसद का स्वयं पर नियंत्रण

  • संसद देश के बड़े मुद्दों के लिए बहस के मंच के रूप में काम करती है, यह कार्य अनुशासन और गरिमापूर्ण होने आवश्यक हैं।
  • सदन पर नियंत्रण के लिए विधायिका का एक अध्यक्ष होता है, जो सदन की कार्रवाई को देखता है।
  • सदन का अध्यक्ष सदस्यों पर नियंत्रण सदस्यों की दल-बदल की नीति को नियंत्रित कर करता है। इसके तहत किसी एक पार्टी में चुने गए नेता अपना दल बदल कर किसी अन्य दल में जाता है, तो या तो उसकी संसद सदस्यता समाप्त कर दी जाएगी या फिर दल में किसी भी राजनीतिक पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।
  • दलबदल को रोकने के लिए 1985 में संविधान का 52वां संशोधन किया गया। इसमें बाद में संविधान में 91वें संशोधन से दुबारा संशोधित किया गया। इसे ही ‘दलबदल निरोधक कानून’ कहा गया।
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