जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय (Jaishankar Prasad Biography In Hindi)

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Ekta Ranga

जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय- हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसमें एक अलग प्रकार की मिठास है। हिंदी हमारी राजभाषा है। हम बचपन से ही इसको पढ़ना और लिखना सीख जाते हैं। हिंदी के महान कवियों और लेखकों से हमारा नाता बचपन के दिनों से ही जुड़ जाता है। तो हमारे पिछली पोस्ट में हमने महान कवि सुमित्रानंदन पंत के जीवन के बारे में जाना। आज की हमारी पोस्ट में भी हम एक ऐसी ही महान शख्सियत के बारे में जानकारी जुटाएंगे। जिसके बारे में हम आज पढ़ेंगे वह अपने ब्रिटिश शासन के वक्त एक राष्ट्र प्रेमी कवि की तरह काम कर रहे थे।

जयशंकर प्रसाद की जीवनी (Biography Of Jaishankar Prasad In Hindi)

काशी नगर अपने आप में बहुत रमणीय है। यहां आपको चारों ओर आध्यात्मिकता देखने को मिलेगी। काशी विश्वनाथ का मंदिर तो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इस शहर के अमूमन लोग लेखकों की श्रेणी में आते हैं। इसी शहर से एक प्रख्यात लेखक भी वास्ता रखता है। यह बात बहुत पुरानी है। शायद आजादी से पहले की कहानी है यह। बनारस जैसे रमणीय शहर से ही ताल्लुक़ रखता था सुँघनी साहू परिवार। तम्बाकू के कारोबार से उनको अच्छा मुनाफा हो रहा था। सुँघनी साहू परिवार का मुखिया था देवीप्रसाद। उसे जल्द ही एक सुंदर बालक की प्राप्ति हुई। आप सोच रहे होंगे कि यहां पर किसकी बात की जा रही है। तो हम आपको बता दे कि यहां पर हम जयशंकर प्रसाद के जीवन के बारे में बात कर रहे हैं। तो आज का हमारा विषय जयशंकर प्रसाद (Jaishankar Prasad) के जीवन पर आधारित है। तो आइए हम जयशंकर प्रसाद की जीवनी (jaishankar prasad ka jivan parichay) हिंदी में पढ़ते हैं।

Jaishankar Prasad Ka Jivan Parichay

जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1889 को वाराणसी में हुआ था। उनकी माता का नाम श्रीमती मुन्नी देवी था। उनके पिता का नाम बाबू देवी प्रसाद था। वह अपने भाई बहन में सबसे छोटे थे। वह अपने माता-पिता की आठवीं संतान थे। उनका परिवार पूरे बनारस में प्रतिष्ठित परिवारों में से एक गिना जाता था। उनके पिता का तम्बाकू का अच्छा व्यापार था। उनके दादा का नाम बाबू शिवरतन साहू था।

नाम जयशंकर प्रसाद
पूरा नाम जयशंकर प्रसाद साहू
उपनाम प्रसाद
जन्म तिथि 30 जनवरी 1889
जन्म स्थान वाराणसी, उत्तर प्रदेश (भारत)
मृत्यु तिथि15 नवम्बर 1937
मृत्यु स्थानवाराणसी, उत्तर प्रदेश (भारत)
मृत्यु के समय आयु 48 वर्ष
देश भारत
पेशा कवि, कहानीकार, नाटककार, उपन्यासकार
भाषासंस्कृत और हिंदी
शैलीअलंकृत एवं चित्रोपम
नाटकचन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, अजातशत्रु
कहानी संग्रहइन्द्रजाल, आँधी
पिता का नाम बाबू देवी प्रसाद
माता का नाम श्रीमती मुन्नी देवी
शिक्षासंस्कृत, फारसी तथा अंग्रेजी जैसी भाषाओं की शिक्षा को भी घर पर रहकर ही सीखा। विविध विषयों का अध्ययन भी घर पर रहकर ही किया।
पत्नी का नामकमला देवी
दादा का नाम बाबू शिवरतन साहू

जयशंकर प्रसाद का बचपन

जयशंकर प्रसाद का जन्म वाराणसी में हुआ था। इनका परिवार बहुत ही समृद्ध परिवारों में से एक था। इनके परदादा के ज़माने से ही सुरती (तम्बाकू का) खूब बड़ा व्यापार चला आ रहा था। इनके दादा बाबू शिवरतन साहू और पिता बाबू देवी प्रसाद साहू बड़े ही परोपकारी स्वभाव के थे। जयशंकर प्रसाद अपने परिवार की आंखों का तारा थे। अपने दादा और पिता की ही तरह वह भी भगवान के बड़े भक्त थे। उनकी माता श्रीमती मुन्नी देवी उनपर खूब प्यार लुटाती थी। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। उनकी माता उनपर ज्यादा दिन तक प्यार नहीं लूटा सकी। वह सबको छोड़कर स्वर्ग सिधार गई। उनका बचपन बड़े ही उतार चढ़ाव के साथ बीता।

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जयशंकर प्रसाद की मुश्किलें

माना कि जयशंकर प्रसाद का परिवार धन से बहुत संपन्न था। पर एक बात एकदम सत्य है कि परिस्थितियां कभी भी एक जैसी नहीं रहती। जयशंकर प्रसाद के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। जब वह मात्र 16 साल के थे तो उनकी माता और बड़े भाई का निधन हो गया था।

थोड़े समय पश्चात ही पिताजी भी चल बसे। उनपर तो मानो जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था। इतने छोटे से किशोर पर घर की जिम्मेदारियां आ जाना बहुत बड़ी बात होती है। जयशंकर प्रसाद पर भी ऐसी ही जिम्मेदारी आ गई थी। लेकिन फिर भी उनके साथ उनके बड़े भाई शम्भूरत्न जी उनका सहारा बनकर खड़े रहे। उनकी पढ़ाई का प्रबंध भी उनके बड़े भाई ने किया। लेकिन दो-तीन साल बाद प्रसाद के सिर से अपने भाई का साया भी उठ गया।

रिश्तेदार लोग उनकी जमीन जायदाद हड़पने को आगे आ गए। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने रिश्तेदारों के षड्यंत्र को पूरा होने से रोक लिया। पिता और भाई के गुजरने से उनके ऊपर ऋण का अतिरिक्त भार आ गया था। लेकिन फिर भी वह बिना हारे अपने कर्तव्यों को पूरा करते रहे।

जयशंकर प्रसाद की शिक्षा

जयशंकर प्रसाद की शिक्षा का जिम्मा उनके बड़े भाई शम्भूरत्न जी ने उठाया था। वह चाहते थे कि प्रसाद अच्छा पढ़ लिखकर या तो बड़ा वकील बने। नहीं तो फिर उनके घरेलू व्यापार को संभाले। शम्भूरत्न जी ने जयशंकर को क्वीस कॉलेज नामक विद्यालय में एडमिशन दिलाया था। वहां पर कुछ दिन तो वह जमकर पढ़े। लेकिन कुछ समय गुजरने के बाद उनका मन पढ़ाई से ऊबने लगा। यह बात जब उनके भाई को पता चली तो वह बहुत क्रोधित हुए।

लेकिन धीरे-धीरे वह यह समझ गए कि उनका मन पढ़ाई की जगह कविताएं लिखने में लग रहा है। उनके भाई ने उनको स्कूल छुड़वा दी। शम्भूरत्न जी ने उनकी पढ़ाई का बंदोबस्त उनके घर पर ही कर दिया। अब घर पर ही उनको शिक्षक पढ़ाने आते थे। वह घर पर ही रहकर संस्कृत, हिंदी, उर्दू और फ़ारसी जैसी भाषाओं पर अपनी पकड़ बना रहे थे। इनके गुरु का नाम दीनबंधु ब्रह्मचारी था। वह उन्हें संस्कृत में निपुण कर रहे थे। वेदों, इतिहास, पुराणों और साहित्य को पढ़ने में भी उन्हें महारत हासिल हो गई थी।

जयशंकर प्रसाद का विवाह

जयशंकर प्रसाद के वैवाहिक जीवन के बारे में कम ही बताया जाता है। उनका विवाह 1906 में विंध्यवाटिनी से हुआ था। इस विवाह के पीछे एक कहानी है। दरअसल उनके बड़े भाई की मृत्यु के चलते घर में बहुत उदासी छा गई थी। घर का माहौल गमगीन रहने लगा था। उनकी भाभी ने सोचा कि अगर प्रसाद का विवाह करवा दिया जाएगा तो घर में खुशियां जरूर आएगी। उनकी भाभी ने उनका विवाह विंध्यवाटिनी से करवा दिया। लेकिन यह विवाह भी ज्यादा दिन तक टिक नहीं सका। क्योंकि विंध्यवाटिनी की बिना कोई कारण ही मौत हो गई।

जयशंकर प्रसाद को गहरा झटका लगा। विंध्यवाटिनी के चले जाने के बाद उन्होंने प्रण किया कि वह पतिव्रत निभाते हुए दूसरी शादी कभी नहीं करेंगे। लेकिन भाग्य के आगे उनकी एक भी ना चली। भाग्य ने उनका विवाह कमला देवी से करवा दिया। अब प्रसाद पिछले गम को भूलकर नए जीवन ली शुरुआत की। जयशंकर और कमला देवी को पुत्र की प्राप्ति भी हुई।

जयशंकर प्रसाद के शौक

जयशंकर प्रसाद को बहुत चीजों का शौक था। उन्हें घूमना-फिरना बहुत पसंद था। कविताएं और कहानियां लिखने का शौक था उन्हें। वह खाली समय में शतरंज खेलते थे, बागवानी करते थे। यहां तक कि अनेक प्रकार के व्यंजन बनाना भी उनका एक बड़ा शौक था। उन्हें नई भाषाएँ सीखने में आनंद की अनुभूति होती थी। वह धार्मिक भी खूब थे।

जयशंकर प्रसाद की धार्मिक यात्राएं

जयशंकर प्रसाद ने अपने बचपन के दिनों में खूब धार्मिक यात्राएं की। यह यात्राएं उन्होंने अपनी माता के साथ की थी। उन्होंने धाराक्षेत्र, ओंकारेश्वर, पुष्‍कर, उज्‍जैन और ब्रज आदि तीर्थों की यात्रा की। इसके अलावा उन्होंने चार धाम की यात्राएं भी की थी। इनको ईश्वर के प्रति सच्ची आस्था हो गई थी। क्योंकि इनके दादा और पिता शिव भक्त थे।

इसलिए वह भी शिव के परम भक्त बन गए थे। उनकी जीवन की एक कहानी बहुत प्रचलित है। कहते हैं कि उनके जब वह होने वाले थे तो उनके माता-पिता भगवान शिव की खूब आराधना करते थे। उनकी माता जब गर्भवती थी तो उन्होंने बैजनाथ और महाकाल बाबा की खूब आराधना की। परिणाम स्वरूप प्रसाद भी धार्मिक स्वभाव के हो गए।

जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध कविताएं

आह! वेदना मिली विदाई

आह! वेदना मिली विदाई
मैंने भ्रमवश जीवन संचित,
मधुकरियों की भीख लुटाई

छलछल थे संध्या के श्रमकण
आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण
मेरी यात्रा पर लेती थी
नीरवता अनंत अँगड़ाई

श्रमित स्वप्न की मधुमाया में
गहन-विपिन की तरु छाया में
पथिक उनींदी श्रुति में किसने
यह विहाग की तान उठाई

लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी
रही बचाए फिरती कब की
मेरी आशा आह! बावली
तूने खो दी सकल कमाई

चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर
प्रलय चल रहा अपने पथ पर
मैंने निज दुर्बल पद-बल पर
उससे हारी-होड़ लगाई

लौटा लो यह अपनी थाती
मेरी करुणा हा-हा खाती
विश्व! न सँभलेगी यह मुझसे
इसने मन की लाज गँवाई

सब जीवन बीता जाता है

सब जीवन बीता जाता है
धूप छाँह के खेल सदॄश
सब जीवन बीता जाता है

समय भागता है प्रतिक्षण में,
नव-अतीत के तुषार-कण में,
हमें लगा कर भविष्य-रण में,
आप कहाँ छिप जाता है
सब जीवन बीता जाता है

बुल्ले, नहर, हवा के झोंके,
मेघ और बिजली के टोंके,
किसका साहस है कुछ रोके,
जीवन का वह नाता है
सब जीवन बीता जाता है

वंशी को बस बज जाने दो,
मीठी मीड़ों को आने दो,
आँख बंद करके गाने दो
जो कुछ हमको आता है

सब जीवन बीता जाता है।

जयशंकर प्रसाद की रचनाएं

काव्य – चित्रधार, कानन कुसुम, तरुणालय, महाराणा का महत्व, प्रेमपथिक, झरना, आँसू, लहर, कामायनी और प्रसाद संगीत।

नाटक – सज्जन, प्रयश्चित, कल्याणी-परिणय, राज्यश्री, विशाख, अजातशत्रु, जनमेजय का नागयज्ञ, कामना, स्कन्दगुप्त, चंद्रगुप्त, एक घूँट, ध्रुवस्वामिनी और अग्निमित्र।

उपन्यास – कंकाल, तितली और इरावती।

कहानी – छाया, प्रतिध्वनि, प्रकाशद्वीप, आँधी और इन्द्रजाल।

निबंध – काव्य और कला तथा अन्य निबंध।

चंपू – उर्वशी और वभुवाहन।

जीवनी – चंद्रगुप्त मौर्य।

काव्य रचनाएं

जयशंकर प्रसाद जी की काव्य रचनाएं हैं – कानन कुसुम, चित्राधार, करुणालय, महाराणा का महत्व, झरना, आंसू, लहर, कामायनी, प्रेम पथिक।

जयशंकर प्रसाद की छोटी कहानियां

तानसेनचंदा
ग्रामदेवदासी
गुंडापंचायत
जहांआराबिसाती
नीराशरणागत
पुरस्काररमला
छायाप्रतिध्वनि
आकाशदीपआंधी और इन्द्रजाल
छोटा जादूगरबभ्रुवाहन
विराम चिन्हमधुआ
उर्वशीइंद्रजाल
गुलामग्राम
स्वर्ग के खंडहर मेंभीख में
चित्र मंदिरब्रह्मर्षि
छायाप्रतिध्वनि
सालवतीअमिट स्मृति
सिकंदर की शपथरसिया बालम

जयशंकर प्रसाद की भाषा शैली

जयशंकर प्रसाद की शुरुआती भाषा शैली ब्रजभाषा थी। उस समय अधिकांश लेखक इसी शैली का इस्तेमाल करते थे। लेकिन यह नहीं है कि वह केवल ब्रजभाषा शैली का ही उपयोग करते थे। उन्होंने खड़ी बोली वाली शैली को भी अपनी कृतियों में अपनाया। इनके द्वारा लिखी गई कृतियों में भावनात्मक, विचारात्मक और चित्रात्मक रूप अच्छे से झलकता था। वह अपनी रचनाओं को बेहद सरल भाषा में लिखने का पूरा प्रयास करते थे।

जयशंकर प्रसाद का निधन

15 नवंबर 1937 को बनारस, उत्तर प्रदेश में जयशंकर प्रसाद ने अंतिम साँस ली थी। जिस समय उनका निधन हुआ था उस समय वह केवल 47 साल के थे। उन्होंने अपने अंतिम दिन अकेले रहकर ही गुजारे। निधन से कई समय पहले ही उनका मोह माया से रिश्ता टूट गया था। उन दिनों में वह इरावती नामक उपन्यास लिख रहे थे। वह काफी समय से बीमारी से जुझ रहे थे। लेकिन उनकी बीमारी क्या थी यह कोई पता नहीं कर पाया। उनके दोस्त और परिवार यह चाहते थे कि वह अपनी बीमारी का उपचार बनारस की जगह कहीं और करवाएं। लेकिन जयशंकर ने उनकी एक भी ना सुनी। और आखिरकार वह इस दुनिया को अलविदा कह गए।

FAQs
Q1. जयशंकर प्रसाद का जन्म कब और कहां हुआ था?

A1. जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1889 को वाराणसी में हुआ था।

Q2. जयशंकर प्रसाद के माता-पिता का नाम क्या था?

A2. जयशंकर प्रसाद के पिता का नाम बाबू देवी प्रसाद साहू था। और माता का नाम श्रीमती मुन्नी देवी था।

Q3. जयशंकर प्रसाद की प्रमुख रचनाएं कौन सी है?

A3. जयशंकर प्रसाद की प्रमुख रचनाएं है- झरना, ऑसू, लहर, कामायनी, प्रेम पथिक (काव्य) स्कंदगुप्त चंद्रगुप्त, पुवस्वामिनी जन्मेजय का नागयज्ञ राज्यश्री, अजातशत्रु, विशाख, एक घूँट, कामना, करुणालय, कल्याणी परिणय, अग्निमित्र प्रायश्चित सज्जन (नाटक) छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आँधी।

Q4. जयशंकर प्रसाद के शौक क्या थे?

A4. जयशंकर प्रसाद को बहुत चीजों का शौक था। उन्हें घूमना-फिरना बहुत पसंद था। कविताएं और कहानियां लिखने का शौक था उन्हें। वह खाली समय में शतरंज खेलते थे, बागवानी करते थे। यहां तक कि अनेक प्रकार के व्यंजन बनाना भी उनका एक बड़ा शौक था।

Q5. जयशंकर प्रसाद के दादा का नाम क्या था?

A5. जयशंकर प्रसाद के दादा का नाम बाबू शिवरतन साहू था।

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