Class 11 Geography Book-1 Ch-13 “महासागरीय जल संचलन” Notes In Hindi

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Navya Aggarwal

इस लेख में छात्रों को एनसीईआरटी 11वीं कक्षा की भूगोल की पुस्तक-1 यानी “भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत” के अध्याय-13 “महासागरीय जल संचलन” के नोट्स दिए गए हैं। विद्यार्थी इन नोट्स के आधार पर अपनी परीक्षा की तैयारी को सुदृढ़ रूप प्रदान कर सकेंगे। छात्रों के लिए नोट्स बनाना सरल काम नहीं है, इसलिए विद्यार्थियों का काम थोड़ा सरल करने के लिए हमने इस अध्याय के क्रमानुसार नोट्स तैयार कर दिए हैं। छात्र अध्याय 13 भूगोल के नोट्स यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

Class 11 Geography Book-1 Chapter-13 Notes In Hindi

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अध्याय- 13 “महासागरीय जल संचलन”

बोर्डसीबीएसई (CBSE)
पुस्तक स्रोतएनसीईआरटी (NCERT)
कक्षाग्यारहवीं (11वीं)
विषयभूगोल
पाठ्यपुस्तकभौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत
अध्याय नंबरतेरह (13)
अध्याय का नाम“महासागरीय जल संचलन”
केटेगरीनोट्स
भाषाहिंदी
माध्यम व प्रारूपऑनलाइन (लेख)
ऑफलाइन (पीडीएफ)
कक्षा- 11वीं
विषय- भूगोल
पुस्तक- भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत
अध्याय- 13 “महासागरीय जल संचलन“
  • महासागर का भौतिक और बाह्य बल इसे गतिमान रखता है, ये गति क्षैतिज और उर्ध्वाधर दोनों तरह की होती हैं।
  • धाराएं– ये जल का निश्चित दिशा में निरंतर बहाव है। धाराओं में जल गतिमान होता है, लेकिन तरंग में जल एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं जाता, लेकिन तरंग आगे बढ़ती रहती है।
  • उर्ध्वाधर गति में महासागर का जल ऊपर और नीचे होता है, यह प्रक्रिया पूरे दिन में दो बार अवश्य होती है।

तरंगे

  • महासागरीय सतह के आर-पार गति करने वाली ऊर्जा ही तरंग है, जब वायु जल को ऊर्जा प्रदान करती है, तब तरंग उत्पन्न होती है।
  • सतही जल की गति से गहरा जल प्रभावित नहीं होता। तरंगों की ढाल से उसकी उत्पत्ति का पता चलता है, युवा तरंग अधिक ढाल वाली होती हैं जो स्थानीय वायु से बनी होती हैं।
  • नियमित गति वाली तरंगे तटों से दूर कहीं बनी हुई होती हैं, इसकी तीव्रता का ज्ञात वायु की गति के आधार पर होता है। खुले महासागरों में अमूमन बड़ी तरंगे पाई जाती हैं।
  • गुरुत्वाकर्षण बल के द्वारा तरंगों का शिखर नीचे खींच लिया जाता है और वायु जल को तरंग रूप में प्रवाहित करती हैं।

ज्वारभाटा

  • समुद्रों में तरंगों का तट की ओर उठना या गिरना सूर्य या चंद्रमा के आकर्षण के कारण होता है, इसे ही ज्वारभाटा कहा जाता है।
  • इनकी उत्पत्ति चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण होती है, वहीं अपकेंद्रीय बल भी गुरुत्वाकर्षण को नियंत्रित करता है, जिससे इनका निर्माण होता है।
  • महोर्मि– जब जल की गति वायु और वायुमंडलीय दाब के कारण बदलती है, तब महोर्मि बनती है, ज्वारभटाओं की तरह ये नियमित तौर पर नहीं बनते।
  • अपकेंद्रीयकरण बल के मुकाबले चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी पर ज्यादा होता है, जिससे ज्वारीय उभार चंद्रमा की ओर ज्यादा आता है।
  • ज्वारों की आकृति तटों पर निर्भर करती है, महाद्वीपों के तटों की विस्तृत आकृति से ज्वारीय उभार अधिक होता है।
  • ज्वारभाटे से प्रभावित जल जब द्वीपों से होता हुआ गुजरता है, तो उसे ज्वारीय धारा कहा जाता है।

ज्वारभाटा के प्रकार

  • ज्वारभाटा को दो हिस्सों में वर्गीकृत किया गया है- आवृति पर आधारीत ज्वारभाटा और सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी की स्थिति पर आधारित ज्वारभाटा।
  • आवृति पर आधारीत ज्वारभाटा– इसके तीन भाग हैं-
    • अर्ध दैनिक ज्वार- सबसे सामान्य ज्वार है, यह दिन और रात में दो बार होता है।
    • दैनिक ज्वार– दिन में एक निम्न और एक उच्च ज्वार इसके अंतर्गत आता है।
    • मिश्रित ज्वार– जिनकी ऊंचाई में भिन्नता होती है, उन्हें ही मिश्रित ज्वार कहा गया है।
  • सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी की स्थिति पर आधारित ज्वारभाटा– इसके अंतर्गत दो ज्वार आते हैं-
    • वृहत ज्वार- जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा सीधी रेखा में होते हैं, तब यह ज्वार बनता है।
    • निम्न ज्वा यह वृहत ज्वार के सात दिन बाद बनता है, जब चाँद और सूर्य एक दूसरे के समकोण होते हैं।
  • ज्वारीय क्रम चंद्रमा की पृथ्वी के नजदीक उपस्थिति के कारण अधिक होता है। चंद्रमा से पृथ्वी की दूरी ज्वारभाटा के क्रम को प्रभावित करती है।
  • सूर्य के पृथ्वी से अधिक समीप आने की स्थिति में (यानी 3 जनवरी को) उच्च और निम्न ज्वार कम होते हैं, और दूरी बढ़ने पर (यानी 4 जुलाई को) उच्च और निम्न ज्वार औसत से कम होते हैं।

ज्वारभाटा का महत्व

  • ज्वारों का पूर्वानुमान लगाकर मछुआरे अपनी रणनीति तैयार कर सकते हैं।
  • इसका महत्व इसलिए भी है, क्योंकि यह ज्वारनदमुख से प्रदूषित जल का निकास करता है।
  • इन ज्वारों का प्रयोग बिजली के उत्पादन में भी किया जा सकता है, जैसे पश्चिम बंगाल में सुंदरवन के दुर्गादुवानी में लगने वाला विद्युत संयत्र भारत के लिए बड़ी उपलब्धि है।

महासागरीय धाराएं

  • महासागरों में होने वाला नदी प्रवाह ही महासागरीय धारा कहलाता है। इसे प्रभावित करने वाले दो बल इस प्रकार हैं-
    • प्राथमिक बल, जो प्रवाह को बल देकर प्रारंभ करता है-
      • सौर ऊर्जा से जल का गर्म होना- इससे जल का फैलाव होता है तथा प्रवणता कम उत्पन्न होने से जलीय प्रभाव ढाल से नीचे हो जाता है।
      • वायु- सतह पर बहने वाली वायु भी जल की गति को प्रभावित करने वाला कारक है।
      • गुरुत्वाकर्षण- गुरुत्वाकर्षण के बल के कारण बैठा हुआ जल दाब प्रवणता में परिवर्तन का कारक है।
      • कोरियोलिस बल- यह बल उत्तरी गोलार्ध के जल को दाईं और दक्षिणी गोलार्ध के जल को बाईं ओर मोड़ देता है, इसके चारों ओर होने वाले बहाव को ही वलय कहा जाता है।
    • द्वितीय बल, ये धारा के प्रभाव को नियंत्रित करता है।
  • महासागरों के जल की ऊर्ध्वाधर गति को पानी के घनत्व में अंतर द्वारा प्रभावित किया जा सकता है।

महासागरीय धाराएं: प्रकार

  • धाराओं को दो भागों में वर्गीकृत किया जाता है-
    • ऊपरी और सतही जलधारा– यह महासागरों का 10% हिस्सा है, ये धाराएं महासागरों के 400 मीटर तक गहरी होती हैं।
    • गहरी जलधारा– यह महासागरों का 90% हिस्सा है, ये घनत्व के भिन्न होने के कारण बहती हैं, ऐसे क्षेत्र जहां का तापमान ठंडा होता है, जिसके कारण गुरुत्वाकर्षण अधिक होता है, यहाँ पानी नीचे की ओर ही रहता है।
  • तापमान के आधार पर धाराओं का वर्गीकरण, ठंडी व गर्म जलधाराएं-
    • ठंडी जल धारा– ये दोनों गोलार्धों में निम्न और मध्य अक्षांश के क्षेत्रों के पश्चिमी महाद्वीपीय तटों पर और उत्तरी गोलार्ध के उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों के पूर्वी महाद्वीपीय तटों पर बहती हैं।
    • ये ठंडा जल गर्म जल क्षत्रों में लेकर जाती हैं।
    • गर्म जलधाराएं- ये दोनों गोलार्धों में निम्न और मध्य अक्षांश के क्षेत्रों के पूर्वी महाद्वीपीय तटों पर और उत्तरी गोलार्ध के उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों के पश्चिमी महाद्वीपीय तटों पर बहती हैं।
    • ये गर्म जल ठंडे जल क्षत्रों में लेकर जाती हैं।

प्रमुख महासागरीय धाराएं एवं उनका प्रभाव

  • ये कोरियालिस और पवनों से प्रभावित होती हैं। इन जलधाराओं का प्रवाह वायुमंडलीय प्रवाह की ही तरह होता है।
  • इनके प्रवाह को मानसून पवनों का प्रवाह भी प्रभावित करता है।
  • कोरियोलिस प्रभाव के कारण अक्षांशों पर निम्न ओर बहने वाली गर्म जल धारा उत्तरी गोलार्ध में बाईं और दक्षिणी गोलार्ध में दाईं तरह हो जाती हैं।
  • मानवीय कार्यों को भी ये धाराएं प्रभावित करती हैं। ठंडी जलधाराएं उष्ण और उपोषण कटिबंधीय क्षेत्रों के महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर बहतीं हैं, ऐसे में यहाँ कोहरा देखने को मिलता है।
  • उच्च और मध्य अक्षांशों पर गर्म जलधाराएं महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर बहती हैं।
  • यहाँ की जलवायु न तो अधिक गर्म न ही अधिक ठंडी होती है।
  • जिन स्थानों की जलवायु गर्म एवं ठंडी होती हैं, वहां प्लैंकटन (जो मछलियों का भोजन है) की आपूर्ति ऑक्सीजन की बढ़ोत्तरी के कारण होती है।
  • ऐसे स्थानों पर ही विश्व के मत्स क्षेत्र मिलते हैं।
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