Class 11 Political Science Book-1 Ch-7 “राष्ट्रवाद” Notes In Hindi

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Navya Aggarwal

इस लेख में छात्रों को एनसीईआरटी 11वीं कक्षा की राजनीति विज्ञान की पुस्तक-1 यानी “राजनीतिक सिद्धांत” के अध्याय-7 “राष्ट्रवाद” के नोट्स दिए गए हैं। विद्यार्थी इन नोट्स के आधार पर अपनी परीक्षा की तैयारी को सुदृढ़ रूप प्रदान कर सकेंगे। छात्रों के लिए नोट्स बनाना सरल काम नहीं है, इसलिए विद्यार्थियों का काम थोड़ा सरल करने के लिए हमने इस अध्याय के क्रमानुसार नोट्स तैयार कर दिए हैं। छात्र अध्याय 7 राजनीति विज्ञान के नोट्स यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

Class 11 Political Science Book-1 Chapter-7 Notes In Hindi

आप ऑनलाइन और ऑफलाइन दो ही तरह से ये नोट्स फ्री में पढ़ सकते हैं। ऑनलाइन पढ़ने के लिए इस पेज पर बने रहें और ऑफलाइन पढ़ने के लिए पीडीएफ डाउनलोड करें। एक लिंक पर क्लिक कर आसानी से नोट्स की पीडीएफ डाउनलोड कर सकते हैं। परीक्षा की तैयारी के लिए ये नोट्स बेहद लाभकारी हैं। छात्र अब कम समय में अधिक तैयारी कर परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त कर सकते हैं। जैसे ही आप नीचे दिए हुए लिंक पर क्लिक करेंगे, यह अध्याय पीडीएफ के तौर पर भी डाउनलोड हो जाएगा।

अध्याय- 7 “राष्ट्रवाद”

बोर्डसीबीएसई (CBSE)
पुस्तक स्रोतएनसीईआरटी (NCERT)
कक्षाग्यारहवीं (11वीं)
विषयराजनीति विज्ञान
पाठ्यपुस्तकराजनीतिक सिद्धांत
अध्याय नंबरसात (7)
अध्याय का नामराष्ट्रवाद
केटेगरीनोट्स
भाषाहिंदी
माध्यम व प्रारूपऑनलाइन (लेख)
ऑफलाइन (पीडीएफ)
कक्षा- 11वीं
विषय- राजनीति विज्ञान
पुस्तक- राजनीतिक सिद्धांत
अध्याय-7 “राष्ट्रवाद”

परिचय

  • राष्ट्रवाद को परिभाषित करना आसान नहीं है, प्रतिवर्ष दिल्ली में होने वाली गणतंत्र दिवस परेड भारतीय राष्ट्रवाद का परिचायक है। राष्ट्रवाद का अध्ययन वैश्विक मामलों को समझने में मदद करता है।
  • इसके अंतर्गत देश के प्रति भावना, बलिदान और समर्पण आदि आते हैं।
  • राजनीतिक सिद्धांत के रूप में राष्ट्रवाद का उदय काफी तेजी से हुआ है। देश में इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के परिणाम देखने को मिले हैं, जैसे-
    • इसने निष्ठा के बहाव को जागृत किया और गहरे द्वेष को भी प्रेरित किया।
    • जनता को जोड़ने और तोड़ने का काम भी किया।
    • इसने कटुता और अत्याचार को कम भी किया, पर साथ ही युद्धों का कारण भी बना।
  • राष्ट्र राज्यों का बंटवारा आज भी जारी है, और कई राष्ट्रों में तो अलगाववाद की भावना भी उभर रही है, और इसने बड़े-बड़े साम्राज्यवाद का पतन भी किया है। भारत को भी इन्हीं संघर्षों के परिणामस्वरूप आजादी मिली।
  • भारत के साथ-साथ विश्व के अन्य देशों में राष्ट्रवाद की भावना के परिणामस्वरूप पृथक राज्यों की मांग उठती रहती है, भारत में यह स्थिति 1960 के दशक में देखी जा चुकी है।
  • इसके अलावा इस तरह के आंदोलन कनाडा, उत्तरी स्पेन, तुर्की, इराक, श्रीलंका जैसे राज्यों में भी देखे जा चुके हैं।

राष्ट्र तथा राष्ट्रवाद

  • राष्ट्र एक परिवार के रूप में होते हुए भी, परिवार से अलग है, परिवार के अंतर्गत मानव एक दूसरे की वैयक्तिक जानकारियों से परिचित होता है, लेकिन राष्ट्र में मानव समुदाय समूह के रूप में रहते हैं, ये समूह वंश, विवाह और परंपरा आदि के कारण जुड़ पाते हैं।
  • राष्ट्र का सदस्य एक दूसरे को प्रत्यक्ष रूप से नहीं जान सकता। इसके बाद भी प्रत्येक मानव अपने राष्ट्र के सदस्यों और राष्ट्र का आदर करता है।
  • राष्ट्र का निर्माण जाति, धर्म और भाषाई समूह के रूप में होने की मान्यताएं हैं, लेकिन किसी भी राष्ट्र का निर्माण इस आधार पर नहीं किया जा सकता, जैसे भारत में, कई भाषाएं बोली जाती हैं, कई अन्य देशों में भी सभी सदस्य किसी एक धर्म का मानने वाले नहीं हैं। यानी किसी राष्ट्र को जोड़ने के लिए कोई समान धर्म नहीं है।
  • राष्ट्र एक काल्पनिक समुदाय है, इसमें लोगों का जुड़ाव विश्वास, आकांक्षाओं और कल्पना के सहारे होता है।

राष्ट्र निर्माण हेतु मान्यताएं

  • साझे विश्वास
    • किसी राष्ट्र का निर्माण भवन निर्माण करने जैसे नहीं है, जिसको देखा जा सकता हो, यह विश्वास के बूते ही खड़ा किया जा सकता है। राष्ट्र की तुलना किसी टीम से किया जाना बेहतर है।
    • जिसमें सभी सदस्यों का अपना अलग महत्व है, परंतु देश समूह के रूप में एक साथ खड़ा होना आवश्यक है।
  • इतिहास
    • एक राष्ट्र के नागरिक स्वयं को एक स्थाई इतिहास की भावना में रख कर देखते हैं।
    • भारत के राष्ट्रविद भारत के लंबे इतिहास के माध्यम से एकता और सभ्यता को भारत की बुनियाद बताया है, जिसके लिए कई साक्ष्य प्रस्तुत किए जाते हैं।
  • भू-क्षेत्र
    • राष्ट्रों की पहचान उसके भौगोलिक क्षेत्रों से जुड़ी है, किसी देश के भूक्षेत्र के इतिहास को कई समय तक साझा करना नागरिकों को एक होने का एहसास कराती है।
    • भूक्षेत्रों पर रहने और अधिकार करने के बाद उसको महत्व प्रदान करते हैं। जैसे अपनी देश की भूमि को मातृभूमि कहना, जैसे यहूदियों का फिलीस्तीन को ‘स्वर्ग’ कहना।
  • साझे राजनीतिक आदर्श
    • नागरिकों द्वारा अपने भविष्य को लेकर एक प्रकार का नजरिया और समान राजनीतिक अस्तित्व बनाने की आकांक्षा ही एक सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण करती है।
    • नागरिकों की साझा चाह के अनुसार अन्य सभी चीजों के साथ वे लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के आधार पर देश का निर्माण चाहते हैं।
  • साझी राजनीतिक पहचान
    • एक तरह की राजनीतिक दृष्टि एकता से पूर्ण राज्य के लिए पर्याप्त नहीं है, नागरिक एक समान जाति, और सांस्कृतिक पहचान चाहते हैं।
    • इससे नागरिकों के बीच के रिश्ते मजबूत होते हैं, लेकिन यह कुछ सघर्षों को भी जन्म देता है।
    • ऐसा इसलिए क्योंकि धर्मों के अंदरूनी स्वरूप भी भिन्न हैं। और समाज में किसी एक धर्म का होना आवश्यक नहीं, जिससे किसी एक धर्म को अधिक मान्यता देने पर अन्य धर्मों और जातियों की अवहेलना होगी।
    • इस कारण ही राष्ट्र का निर्माण राजनीतिक तौर पर किया जाता है, न कि सांस्कृतिक तौर पर, जिससे सभी धर्मों के नागरिकों को संविधान में दर्जा दिया जा सके।

राष्ट्रीय आत्म-निर्णय

  • सामाजिक समूहों द्वारा मांग की जाती है कि उन्हें आत्म-निर्णय का अधिकार दिया जाए। राष्ट्र वैश्विक स्तर पर बने समुदायों से पृथक राज्य की मांग करते हैं।
  • इन मांगों के कारण भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। जैसे 19वीं सदी में एक संस्कृति, एक राज्य ने जोर पकड़ा, जिसको प्रथम विश्व युद्ध के बाद अपनाया गया। इसके परिणाम स्वरूप विस्थापन के कारण, कई लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा।
  • इन सभी कार्रवाइयों को मनचाहा परिणाम नहीं मिल सका।
  • जब एशिया और अफ्रीका ने उपनिवेशवाद से मुक्ति के लिए संघर्ष किया, तब राष्ट्रीय आत्म-निर्माण की मांग उठी। उनके अनुसार इससे वे सम्मान प्राप्त कर सकेंगे।
  • इसी कारण जिन राष्ट्रों ने संघर्षरत होकर स्वतंत्रता प्राप्त की, वे विरोधाभास की स्थिति में है। और आज ये अपने देश के अंतर्गत राष्ट्रीय आत्म-निर्णय की स्थिति के खिलाफ हैं।
  • आत्म निर्णय की इस समस्या से निपटने का समाधान वैश्विक स्तर पर खोज जा रहा है जिसमें अधिकतर यह राय देते हैं, कि पृथक राज्य बनाकर नहीं राज्यों को अधिक लोकतांत्रिक और समतामूलक बनाकर इसका समाधान निकाला जा सकता है।
  • इससे समस्या का समाधान और राष्ट्र में एकता का निर्माण किया जा सकता है।

राष्ट्रवाद तथा बहुलवाद

  • एक ही राष्ट्र में विभिन्न धर्मों और जातियों का एक साथ होना बेहद जरूरी हो जाता है, इसके लिए लोकतान्त्रिक देशों की सरकार अल्पसंख्यकों की पहचान और संरक्षण का कार्य करती है, जैसे भारतीय संविधान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुरक्षित करने के कई प्रावधान दिए गए हैं।
  • अल्पसंख्यकों के समूहों को प्रदत्त अधिकार-
    • भाषा, संस्कृति और धर्म के संरक्षण का अधिकार।
    • विधायी और राजकीय संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का अधिकार।
  • इन समूहों की मान्यता राष्ट्रीय समुदाय के अंग के रूप में भी होती है।
  • इसके बाद भी कई समूह पृथक राज्य की मांग कर बैठते हैं, जो कि विरोधाभासी भी प्रतीत होता है।
  • प्रत्येक राष्ट्रीय समूह को अलग राज्य प्रदान करना मुश्किल है। इससे देश में छोटे-छोटे राज्यों में कई आर्थिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
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