Class 11 Geography Book-1 Ch-14 “जैव विविधता एवं संरक्षण” Notes In Hindi

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Navya Aggarwal

इस लेख में छात्रों को एनसीईआरटी 11वीं कक्षा की भूगोल की पुस्तक-1 यानी भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत” के अध्याय-14 ”जैव विविधता एवं संरक्षण” के नोट्स दिए गए हैं। विद्यार्थी इन नोट्स के आधार पर अपनी परीक्षा की तैयारी को सुदृढ़ रूप प्रदान कर सकेंगे। छात्रों के लिए नोट्स बनाना सरल काम नहीं है, इसलिए विद्यार्थियों का काम थोड़ा सरल करने के लिए हमने इस अध्याय के क्रमानुसार नोट्स तैयार कर दिए हैं। छात्र अध्याय 14 भूगोल के नोट्स यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

Class 11 Geography Book-1 Chapter-14 Notes In Hindi

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अध्याय- 14 “जैव विविधता एवं संरक्षण”

बोर्डसीबीएसई (CBSE)
पुस्तक स्रोतएनसीईआरटी (NCERT)
कक्षाग्यारहवीं (11वीं)
विषयभूगोल
पाठ्यपुस्तकभौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत
अध्याय नंबरचौदह (14)
अध्याय का नाम”जैव विविधता एवं संरक्षण”
केटेगरीनोट्स
भाषाहिंदी
माध्यम व प्रारूपऑनलाइन (लेख)
ऑफलाइन (पीडीएफ)
कक्षा- 11वीं
विषय- भूगोल
पुस्तक- भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत
अध्याय-14 “जैव विविधता एवं संरक्षण”

जैव विविधता

  • जैव विविधता वनस्पतियों की विविध किस्मों से संबंधित है, वनस्पतियों की अच्छी मात्रा में उपलब्धता वाले स्थान वे ही हैं, जहां जल और सौर ऊर्जा की उपलब्धता है।
  • सौर ऊर्जा और जल के कारण ही जैव विविधता संभव है, इन दोनों की उपलब्धता से संबंधित स्थान में जैव विविधता पाई जा सकती है।
  • जैव विविधता सभी स्थानों पर एक समान नहीं होती, ये उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में विस्तृत और ध्रुवीय क्षत्रों की तरफ कम होती जाती है।
  • जैव-विविधता का अर्थ है किसी स्थान पर पाए जाने वाले जीवों की विविधता और संख्या। उदाहरण- पौधों के विविध प्रकार, जीवों और सूक्ष्म जीवों की विविधता। यह सजीव संपदा है।
  • इसको समझने के लिए तीन वर्गों में विभाजन मिलता है-
    • आनुवंशिक जैविविधता- प्रजातियों में पाया जाने वाला जीन एक प्रजाति की दूसरी प्रजाति से आनुवंशिक जैवविविधता को दर्शाता है।
    • ऐसे जीव जो भौतिक लक्षणों के आधार पर एक जैसे हैं, वे एक प्रजाति के कहलाएंगे, मानव ‘होमोसेपीयन’ प्रजाति का है।
    • आनुवंशिक विविधता मानव को कई आधारों पर भिन्न बनाती है। विभिन्न प्रजातियों का विकास जैव विविधता से ही संभव है।
    • प्रजातीय जैव विविधता – यह किसी क्षेत्र में प्रजातियों की संख्या को दर्शाती है। कहीं किसी प्रजाति की संख्या ज्यादा या कम हो सकती है, ज्यादा संख्या और विविधता में पाई जाने वाली प्रजातियों वाले क्षेत्रों को हॉट-स्पॉट कहा जाता है।
    • परितंत्रिक जैव विविधता– इसके अंतर्गत पारितंत्रों में पाई जाने वाली भिन्नता, उनकी पारितंत्रिक प्रतिक्रियाएं और भिन्न आवास स्थान, इस प्रकार की पारितंत्रिक विविधता का निर्माण करते हैं।

जैव विविधता का महत्व

  • मानव संस्कृति के विकास में जैव विविधता का बड़ा योगदान रहा है।
  • इसकी आर्थिक, वैज्ञानिक और पारिस्थितिक भूमिकाएं इस प्रकार हैं-
    • पारिस्थितिकीय भूमिका- पारितंत्र में प्रजातियों की क्रियाएं होना आम हैं, यहाँ का जीवन एक दूसरे पर अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से निर्भर होता है।
    • विभिन्न प्रजातियाँ ऊर्जा का संग्रहण कर, कार्बनिक पदार्थों का विघटन और निर्माण करती हैं, जिससे पारितंत्र में पोषक तत्वों का चक्र बनता है।
    • इससे जलवायु नियंत्रित रहती है। पारितंत्र की विविधता से प्रजातियाँ सही स्थिति में रहतीं हैं और इससे उनकी उत्पादकता बढ़ती है। विविधता से भरपूर पारितंत्र स्थाई पारितंत्र कहलाता है।
    • आर्थिक भूमिका– मनुष्य के लिए जैव-विविधता के सभी स्वरूप महत्वपूर्ण हैं। इनमें से कृषि विविधता बेहद महत्वपूर्ण है। जैव विविधता के परिणाम के रूप में मानव के पास खाद्य फसलें, मत्सय आदि कई उत्पाद हैं जो मानव की आर्थिक सहायता भी करते हैं।
    • वैज्ञानिक भूमिका– जैव विविधता की सहायता से प्रत्येक प्रजाति की जैव विविधता में भूमिका स्पष्ट होती है। इससे सभी जीवों के जीवन की महत्वता का पता चलता है।

जैव विविधता का ह्रास के कारण

  • जनसंख्या वृद्धि- इसने प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को अधिक बढ़ा दिया है, जिसके कारण प्रजातियों और उनके लिए आवास स्थानों में कमी आई है। उष्णकटिबंधीय प्रदेशों में रहने वाली जनसंख्या की जरूरतों को यहाँ के वृक्षों की कटाई और कई संसाधनों के ह्रास द्वारा पूरा किया गया। यहाँ विश्व की करीब 50% प्रजातियाँ वास करती हैं।
  • प्राकृतिक आपदाएं– क्षेत्र विशेष में भूकंप, बाढ़, ज्वालामुखी उद्गार, भूस्खलन आदि आपदाओं से वहां के वनस्पतियों और जीवों को क्षति होती है। इसके कारण प्रदेश की जैव विविधता में परिवर्तन आ जाता है। विषैली गैसें और कीटनाशक भी इन प्रजातियों के लिए हानिकारक हैं।
  • विदेशज प्रजातियाँ– ऐसी प्रजातियाँ जो किसी स्थान से लेकर आई गईं हैं, इनसे भी मूल जैव्य समुदाय का नुकसान हुआ है, कई दशकों में जंतुओं का शिकार करने के कारण प्रजातियाँ विलुप्त भी हुई हैं।
  • IUCN ने इन विलुप्त प्रजातियों को संरक्षण के लिए तीन भागों में बाँटा है-
    • संकटापन्न प्रजातियाँ– जो प्रजीतियाँ विलुप्त होने के खतरे में हैं, इसके अंतर्गत आती हैं। इनकी सूचना IUCN द्वारा रेड लिस्ट जारी करके दी जाती है।
    • सुभेद्य प्रजातियाँ– इनमें वे प्रजीतियाँ आती हैं जिनके संरक्षण के लिए यदि कारगर कदम नहीं उठाए गए, तो ये ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह सकेंगी।
    • दुर्लभ प्रजातियाँ– ये सम्पूर्ण विश्व में बेहद कम बची प्रजातियाँ हैं, एवं विस्तृत क्षेत्रों में ये प्रजातियाँ विरल रूप में ही पाई जाती हैं।

जैव विविधता का संरक्षण

  • मानव जीवन को बचाने के लिए जैव विविधता को बचाए रखना अनिवार्य है, परस्पर निर्भरता के चलते किसी एक प्रजाति पर आने वाला संकट दूसरी प्रजाति के लिए भी संकट उत्पन्न करता है।
  • जैसे पौधों एवं वनस्पतियों पर आने वाला संकट्ट प्रत्यक्ष रूप से मानव जीवन को भी प्रभावित करता है।
  • ऐसे में मानव के लिए विकास के ऐसे मार्ग को चुनना होगा जो दूसरे जीवों के विकास और पोषण में बाधा न बने।
  • प्रजातियों को संरक्षण देने के साथ-साथ संरक्षण की प्रक्रिया को बनाए रखना भी जरूरी है।
  • भारत के साथ 155 देशों ने ब्राजील के रियो में, पृथ्वी सम्मेलन पर 1992 में जैव विविधता को बचाने के लिए हस्ताक्षर किए।
  • इसमें जैव विविधता के कुछ तरीके सुझाए गए-
    • ऐसे कदम उठाए जाएं जिनसे संकटापन्न प्रजातियों का संरक्षण हो।
    • लुप्त हो रही प्रजातियों के संरक्षण के लिए योजना बनाई जाएं।
    • वन्य प्रजातियों का संरक्षण किया जाए।
    • वन्य जीवों के आवास स्थानों को पृथक कर सुरक्षित रखा जाए।
    • प्रजातियों के लिए पोषण और विकसित होने वाले स्थानों को संरक्षित किया जाए।
    • किसी भी जीव या पौधों का व्यापार अंतर्राष्ट्रीय नियमों के अनुसार किया जाए।
  • विभिन्न प्रकार की प्रजातियों को संरक्षण और सुरक्षा प्रदान करने के लिए भारत सरकार के कदम-
    • 1972, वन्य जीव सुरक्षा एक्ट– इसमें नेशनल पार्क, पशु-विहार की स्थापना और जीव मण्डल रीज़र्व्ड क्षेत्र घोषित हुए।
    • ऐसे क्षेत्र जहां जैव विविधता का बड़ा स्तर पाया जाता है, महा विविधता केंद्र कहा जाता है, जैसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्र।
    • इसके अंतर्गत 12 देश शामिल हैं, जिसमें भारत भी शामिल है, ये देश विस्तृत महा विविधता लिए हुए हैं।
    • जिन क्षेत्रों में संसाधनों की उपलब्धता से संबंधित संकट हैं, IUCN ने इन क्षेत्रों को जैव विविधता के हॉट स्पॉट के रूप में चिन्हित किया है।
    • हॉट स्पॉट के क्षेत्रों में रहने वाली प्रजाति अपनी आधारभूत जरूरतों के लिए यहाँ की पारितंत्र पर ही पूर्ण रूप से निर्भर हैं।
    • उदाहरण- मेडागास्कर की पौधों और जीवों की 85% संख्या अन्य किसी भी देश में नहीं पाए जाते हैं।
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