भगवान श्री कृष्ण (कहानी-3) चावल के एक दाने की कहानी

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Ekta Ranga

भगवान श्री कृष्ण के चमत्कार और उदारता से हर कोई परिचित है उनके कितने ही ऐसे उदारता के उदाहरण है जिसके चलते उन्होंने अपने भक्तों की लाज रखी। सबसे बड़ा उदाहरण तो द्रौपदी का है जहां पर श्री कृष्ण ने द्रौपदी को चीर हरण से बचाया था।

एक ऐसा ही किस्सा महाभारत काल से ही जुड़ा है। एक बार कुछ ऐसा हुआ कि पांडवों को वनवास भेज दिया गया। और जो कौरव थे उन्हें राजमहल में ही रहने का आदेश मिल गया था। अब बेचारे पांडवों को वन में रहकर कष्ट झेलने पड़ रहे थे। और कौरवों को राजमहल की विलासिता भोगने का मौका मिला था। लेकिन पांडव बिना थके हारे वनवास काट रहे थे।

एक बार ऐसा हुआ कि महर्षि दुर्वासा जंगल से अपने आश्रम की ओर जा रहे थे। उनके साथ उनके कुछ शिष्य भी थे। चलते-चलते दोपहर से कब शाम होने चली थी यह पता ही नहीं चला। ऐसे में महर्षि दुर्वासा ने सोचा कि क्यों ना आज रात को कहीं पर विश्राम कर लिया जाए।

उनके शिष्यों ने बताया कि पास में ही हस्तिनापुर का राजमहल है तो क्यों ना वहीं पर ही विश्राम किया जाए। महर्षि दुर्वासा भी इस बात के लिए राजी भी हो गए। राजमहल पहुंचने पर उन सभी की खूब अच्छे से खातिरदारी की गई। रात को सभी ने अच्छे से नींद ली। फिर जब सुबह हुई तो सब वहां से जाने के लिए रवाना होने लगे।

लेकिन दुर्योधन और शकुनी मामा ने उन्हें सुबह के खाने के लिए रोका तो महर्षि दुर्वासा ने कहा कि सुबह वह और उनके सभी शिष्य कहीं और खाएंगे। इस बात पर दुर्योधन के दिमाग में षडयंत्र छिड़ गया। उसने महर्षि दुर्वासा से कहा कि वह उसके पांडव भाई युधिष्ठिर की कुटिया में जाकर भोजन कर लें। फिर महर्षि दुर्वासा अपने शिष्यों के साथ युधिष्ठिर की कुटिया की ओर रवाना हो गए।

उनके जाने के पश्चात दुर्योधन ने अपने मामा से कहा कि उसने महर्षि दुर्वासा को युधिष्ठिर के यहां पर अपमानित होने के लिए भेजा है। उसने यह भी कहा कि जिस समय महर्षि वहां पहुंचेंगे तब तक सभी पांडव भोजन समाप्त कर चुके होंगे। ऐसे में मौके पर भोजन नहीं मिलने पर महर्षि क्रोधित होकर उनको श्राप दे देंगे। शकुनी ने इस साजिश के लिए दुर्योधन को शाबाशी दी।

आखिरकार महर्षि दुर्वासा अपने शिष्यों के साथ पांडवों की कुटिया तक पहुंच गए। वहां पहुंचने पर जैसे ही युधिष्ठिर ने उन सभी को देखा तो उसने सभी को प्रणाम किया। महर्षि दुर्वासा ने युधिष्ठिर के यहां भोजन खाने की इच्छा व्यक्त कर दी। महर्षि ने कहा कि पहले वह और उसके शिष्य नदी में स्नान करेंगे फिर उसके बाद वह भोजन करेंगे। लेकिन दुविधा यह थी कि भोजन तो समाप्त हो गया था।

अपने मन की इस उलझन को लेकर वह सीधे द्रौपदी के पास पहुंचा। द्रौपदी बिखरे हुए बर्तनों को धोने के लिए उठा रही थी। जब द्रौपदी को यह बात पता चली तो वह बहुत ज्यादा डर गई। उसने युधिष्ठिर से कहा, “नाथ, हम उन सभी को एकाएक क्या भोजन खिलाएंगे। हमारे यहां तो दोपहर का भोजन समाप्त हो गया है।” अब द्रौपदी को केवल एक ही जने का स्मरण मन में आया। द्रौपदी को पता था कि अब केवल श्री कृष्ण ही उनकी सहायता कर सकते हैं। ऐसा कैसे हो सकता था कि द्रौपदी कृष्ण जी को पुकारे और कृष्ण जी ना आए। आखिर कृष्ण जी ने द्रौपदी को अपनी बहन जो माना था।

जैसे ही द्रौपदी ने श्री कृष्ण को अपनी व्यथा सुनाई, श्री कृष्ण ने द्रौपदी को अक्षय पात्र लाने को कहा। अक्षय पात्र एक ऐसा पात्र था जिसे सूर्य भगवान ने युधिष्ठिर को भेंट किया था। ऐसे पात्र में कभी भी खाना खत्म नहीं होता है। द्रौपदी अक्षय पात्र को लेने गई तो पाया कि उस पात्र में तो चावल के दो तीन दाने ही बचे थे। ऐसे में द्रौपदी की चिंता और भी ज्यादा बढ़ गई। पर श्री कृष्ण ने उसको शांत किया और चावल के तीनों दाने ही खा लिए।

श्री कृष्ण ने जैसे ही वह दाने खाए वैसे ही महर्षि दुर्वासा और उनके समस्त शिष्यों की कुदरती रूप से भूख शांत हो गई। अब जैसे ही वह सभी स्नान करके युधिष्ठिर की कुटिया में लौटे तो उन सभी ने कहा कि उनकी भूख शांत हो गई है। और अब उन्हें खाने की कुछ भी इच्छा नहीं हो रही है। यह बात सुनते ही द्रौपदी के मुख पर एक बड़ी सी मुस्कान उभर आई। अब उसे समझ में आ गया था कि आज फिर से श्री कृष्ण ने अपनी लीला से उसकी लाज बचा ली थी।

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