एनसीईआरटी समाधान कक्षा 10 इतिहास अध्याय 1 यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय

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Ekta Ranga

आप इस आर्टिकल से कक्षा 10 इतिहास अध्याय 1 यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय के प्रश्न उत्तर प्राप्त कर सकते हैं। यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय के प्रश्न उत्तर परीक्षा की तैयारी करने में बहुत ही लाभदायक साबित होंगे। इन सभी प्रश्न उत्तर को सीबीएसई सिलेबस को ध्यान में रखकर बनाया गया है। कक्षा 10 इतिहास पाठ 1 के एनसीईआरटी समाधान से आप नोट्स भी तैयार कर सकते हैं, जिससे आप परीक्षा की तैयारी में सहायता ले सकते हैं। हमें बताने में बहुत ख़ुशी हो रही है कि यह सभी एनसीईआरटी समाधान पूरी तरह से मुफ्त हैं। छात्रों से किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जायेगा।

Ncert Solutions For Class 10 History Chapter 1 In Hindi Medium

हमने आपके लिए यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय के प्रश्न उत्तर को संक्षेप में लिखा है। इन समाधान को बनाने में ‘राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद’ की सहायता ली गई है। यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय पाठ बहुत ही रोचक है। इस अध्याय को आपको पढ़कर और समझकर बहुत ही अच्छा ज्ञान मिलेगा। आइये फिर नीचे कक्षा 10 इतिहास अध्याय 1 यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय के प्रश्न उत्तर (Class 10 History Chapter 1 Question Answer In Hindi Medium) देखते हैं।

कक्षा 10 इतिहास अध्याय 1 यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय

संक्षेप में लिखें

प्रश्न 1 – निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखें –

(क) ज्युसेपे मेत्सिनी

उत्तर :- ज्युसेपे मेत्सिनी को पूरी दुनिया एक महान क्रांतिकारी व्यक्ति के रूप में जानती है। उनका जन्म साल 1807 जेनोआ में हुआ था। मेत्सिनी ने लिगुरिया में क्रांति छेड़कर पूरी दुनिया में सनसनी मचा दी थी। उस वक्त उसकी उम्र मात्र 24 साल की थी। यह क्रांति करने के लिए उसे अपने देश को छोड़ने का फरमान सुना दिया गया था। उसे यंग इटली और यंग यूरोप जैसे दो भूमिगत संगठनों की नींव रखने का श्रेय जाता है। यंग इटली की स्थापना मार्सेई में की गई थी। और यंग यूरोप की स्थापना बर्न में की गई थी। उसका यह यह कहना था की ईश्वर की यही कामना है कि राष्ट्र को ही इंसानों कि प्राकृतिक इकाई के रूप में स्वीकार किया जाए। मेत्सिनी लोगों कि रुढ़िवादी सोच को खत्म करना चाहता था। उसका केवल एक ही सपना था – राजतंत्र की हार और प्रजातांत्रिक गणतंत्र की जीत।

(ख) काउंट कैमिली दे कावूर

उत्तर :- ज्युसेपे मेत्सिनी के बाद अगर इटली में किसी को ताकतवर माना जाता है तो वो है काउंट कैमिली दे कावूर। दुनिया उसको एक महान नेता के रूप में याद करती है। मेत्सिनी की तरह कावूर क्रांतिकारी व्यक्ति नहीं था। वह शिक्षित और अमीर परिवार से वास्ता रखता था। वह फ्रेंच भाषा धाराप्रवाह बोलता था। उसने एक चतुर कूटनीतिक संधि के तहत सार्डिनिया को जीत लिया था। उसने इटली के एकीकरण के सपने को पूरा किया था। उसने इटली के आम लोगों को एकीकरण के लिए जागरूक किया। उसने पीडमोंट में अनेकों आर्थिक सुधार किए। काउंट कैमिलो दे कावूर ने ज्यूसेपे गैरीबाल्डी के साथ राजनयिक गठबंधन करके ऑस्ट्रिया की सेना को बुरी तरह परास्त कर दिया। काउंट कैमिलो दे कावूर को लोग आज भी इटली के दिग्गज मुख्यमंत्री के रूप में जानते हैं।

(ग) यूनानी स्वतंत्रता युद्ध

उत्तर :- एक घटना जिसने पूरे यूरोप के शिक्षित अभिजात वर्ग में राष्ट्रीय भावनाओंका संचार किया, वह थी, यूनान का स्वतंत्रता संग्राम। पंद्रहवीं सदी से यूनान ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा था। यूरोप में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की प्रगति से यूनानियों का आज़ादी के लिए संघर्ष 1821 में आरंभ हो गया। यूनान में राष्ट्रवादियों को निर्वासन में रह रहे यूनानियों के साथ पश्चिमी यूरोप के अनेक लोगों का भी समर्थन मिला जो प्राचीन यूनानी संस्कृति (Hellenism) के प्रति सहानुभूति रखते थे। कवियों और कलाकारों ने यूनान को यूरोपीय सभ्यता का पालना बता कर प्रशंसा की और एक मुस्लिम साम्राज्य के विरुद्ध यूनान के संघर्ष के लिए जनमत जुटाया। अंग्रेज कवि लॉर्ड बायरन ने धन इकट्ठा किया और बाद में युद्ध में लड़ने भी गए जहाँ 1824 में बुखार से उनकी मृत्यु हो गई। अंततः 1832 की कुस्तुनतुनिया की संधि ने यूनान को एक स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता दी।

(घ) फ्रैंकफ़र्ट ससंद

उत्तर :- जर्मन इलाकों में बड़ी संख्या में राजनीतिक संगठनों ने फ्रैंकफर्ट शहर में मिल कर एक सर्व- जर्मन नेशनल एसेंबली के पक्ष में मतदान का फ़ैसला लिया। 18 मई 1848 को 831 निर्वाचित प्रतिनिधियों ने एक सजे-धजे जुलूस में जा कर फ्रैंकफर्ट संसद में अपना स्थान ग्रहण किया। यह संसद सेंट पॉल चर्च में आयोजित हुई। उन्होंने एक जर्मन राष्ट्र के लिए एक संविधान का प्रारूप तैयार किया। इस राष्ट्र की अध्यक्षता एक ऐसे राजा को सौंपी गई जिसे संसद के अधीन रहना था। जब प्रतिनिधियों ने प्रशा के राजा फ्रेडरीख विल्हेम चतुर्थ को ताज पहनाने की पेशकश की तो उसने उसे अस्वीकार कर उन राजाओं का साथ दिया जो निर्वाचित सभा के विरोधी थे। जहाँ कुलीन वर्ग और सेना का विरोध बढ़ गया, वहीं संसद का सामाजिक आधार कमज़ोर हो गया। संसद में मध्य वर्गों का प्रभाव अधिक था जिन्होंने मजदूरों और कारीगरों की माँगों का विरोध किया जिससे वे उनका समर्थन खो बैठे। अंत में सैनिकों को बुलाया गया और एसेंबली भंग होने पर मजबूर हुई।

(ङ) राष्ट्रवादी संघर्षो में महिलाओ की भूमिका

उत्तर :- उदारवादी आंदोलन के अंदर महिलाओं को राजनीतिक अधिकार प्रदान करने का मुद्दा विवादास्पद था। हालाँकि आंदोलन में वर्षों से बड़ी संख्या में महिलाओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया था। महिलाओं ने अपने राजनीतिक संगठन स्थापित किए, अखबार शुरू किए और राजनीतिक बैठकों और प्रदर्शनों में शिरकत की। इसके बावजूद उन्हें एसेंबली के चुनाव के दौरान मताधिकार से वंचित रखा गया था। जब सेंट पॉल चर्च में फ्रैंकफर्ट संसद की सभा आयोजित की गई थी तब महिलाओं को केवल प्रेक्षकों की हैसियत से दर्शक दीर्घा में खड़े होने दिया गया।

प्रश्न 2 – फ्रांसीसी लोगों के बीच सामूहिक पहचान का भाव पैदा करने के लिए फ्रांसीसी क्रांतिकारियों ने क्या कदम उठाए?

उत्तर :- प्रारंभ से ही फ़्रांसीसी क्रांतिकारियों ने ऐसे अनेक क़दम उठाए जिनसे फ़्रांसीसी लोगों में एक सामूहिक पहचान की भावना पैदा हो सकती थी। पितृभूमि (la patrie) और नागरिक (le citoyen) जैसे विचारों ने एक संयुक्त समुदाय के विचार पर बल दिया जिसे एक संविधान के अंतर्गत समान अधिकार प्राप्त थे। अतः एक नया फ्रांसीसी झंडा – तिरंगा (the tricolour) चुना गया जिसने पहले के राजध्वज की जगह ले ली। इस्टेट जनरल का चुनाव सक्रिय नागरिकों के समूह द्वारा किया जाने लगा और उसका नाम बदल कर नेशनल एसेंबली कर दिया गया। नयी स्तुतियाँ रची गई शपथ ली गई, शहीदों का गुणगान हुआ और यह सब राष्ट्र के नाम पर हुआ। एक केंद्रीय प्रशासनिक – व्यवस्था लागू की गई जिसने अपने भू-भाग में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए समान कानून बनाए। आंतरिक आयात-निर्यात शुल्क समाप्त कर दिए गए और भार तथा नापने की एक समान व्यवस्था लागू की गई। क्षेत्रीय बोलियों को हतोत्साहित किया गया और पेरिस में फ्रेंच जैसी बोली और लिखी जाती थी, वही राष्ट्र की साझा भाषा बन गई।

प्रश्न 3 – मारीआन और जर्मेनिया कौन थे? जिस तरह उन्हें चित्रित किया गया उसका क्या महत्त्व था?

उत्तर :- मारीआन और जर्मेनिया दोनों ही नारी का काल्पनिक स्वरूप थी। इन दोनों ही प्रतीकों को शक्तिशाली माना गया। अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में नारी की छवि राष्ट्र का रूपक बन गई थी।

मारीआन का महत्व – फ्रांस में उसे लोकप्रिय ईसाई नाम मारीआन दिया गया जिसने जन- राष्ट्र के विचार को रेखांकित किया। उसके चिह्न भी स्वतंत्रता और गणतंत्र के थे लाल टोपी, तिरंगा और कलगी। मारीआन की प्रतिमाएँ सार्वजनिक चौकों पर लगाई गई ताकि जनता को एकता के राष्ट्रीय प्रतीक की याद आती रहे और लोग उससे तादात्म्य स्थापित कर सकें। मारीआन की छवि सिक्कों और डाक टिकटों पर अंकित की गई।

जर्मेनिया का महत्व – जर्मेनिया, जर्मन राष्ट्र का रूपक बन गई। चाक्षुष अभिव्यक्तियों में जर्मेनिया बलूत वृक्ष के पत्तों का मुकुट पहनती है क्योंकि जर्मन बलूत वीरता का प्रतीक है।

प्रश्न 4 – जर्मन एकीकरण की प्रक्रिया का संक्षेप में पता लगाएँ।

उत्तर :- जर्मन एकीकरण की प्रक्रिया कुछ इस प्रकार थी –

(1) साल 1848 के बाद से पूरे यूरोप में राष्ट्रवाद का जनतंत्र और क्रांति से अलगाव होने लगा था। जर्मनी के आम लोगों के दिल में राष्ट्रवाद का प्रेम फूट पड़ा था।

(2) जर्मन नागरिकों में संविधान, प्रेस की स्वतंत्रता और संगठन बनाने की आजादी को लेकर जबरदस्त लहर दौड़ पड़ी।

(3) 1848 में जर्मन महासंघ के विभिन्न इलाकों को जोड़ कर एक निर्वाचित संसद द्वारा शासित राष्ट्र-राज्य बनाने का प्रयास किया था। मगर राष्ट्र निर्माण की यह उदारवादी पहल राजशाही और फ़ौज की ताकत ने मिलकर दबा दी।

(4) लेकिन कुछ ही समय बाद प्रशा ने राष्ट्रीय एकीकरण के आंदोलन का नेतृत्व संभाल लिया। उसका प्रमुख मंत्री. ऑटो वॉन बिस्मार्क इस प्रक्रिया का जनक था। बिस्मार्क ने प्रशा की सेना और नौकरशाही की मदद ली।

(5) तकरीबन सात वर्ष तक बिस्मार्क की अगुवाई में प्रशा ने ऑस्ट्रिया, डेन्मार्क और फ्रांस से युद्ध लड़ा। सात साल की मेहनत के बाद आखिरकार प्रशा की जीत हुई और जर्मनी के एकीकरण का सपना पूरा हुआ।

प्रश्न 5 – अपने शासन वाले क्षेत्रों में शासन व्यवस्था को ज्यादा कुशल बनाने के लिए नेपोलियन ने क्या बदलाव किए?

उत्तर :- 1804 की नागरिक संहिता जिसे आमतौर पर नेपोलियन की संहिता के नाम से जाना जाता है, ने जन्म पर आधारित विशेषाधिकार समाप्त कर दिए थे। उसने कानून के समक्ष बराबरी और संपत्ति के अधिकार को सुरक्षित बनाया। इस संहिता को फ़्रांसीसी नियंत्रण के अधीन क्षेत्रों में भी लागू किया गया। डच गणतंत्र, स्विट्ज़रलैंड, इटली और जर्मनी में नेपोलियन ने प्रशासनिक विभाजनों को सरल बनाया, सामंती व्यवस्था को खत्म किया और किसानों को भू-दासत्व और जागीरदारी शुल्कों से मुक्ति दिलाई। शहरों में भी कारीगरों के श्रेणी संघों के नियंत्रणों को हटा दिया गया। यातायात और संचार व्यवस्थाओं को सुधारा गया। किसानों, कारीगरों, मज़दूरों और नए उद्योगपतियों ने नई-नई मिली आजादी चखी।

चर्चा करें

प्रश्न 1 – उदारवादियों की 1848 की क्रांति का क्या अर्थ लगाया जाता है? उदारवादियों ने किन राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक विचारों को बढ़ावा दिया?

उत्तर :- उदारवादियों की क्रांति एकदम अलग थी। जिस समय 1848 में यह क्रांति हुई तब उसी साल किसानों और गरीबों के बीच भूखमरी फैली हुई थी। लेकिन इसी दौरान पढ़े – लिखे लोगों के बीच क्रांति फैल गई।

राजनैतिक क्षेत्र में परिवर्तन

(1) फ़रवरी 1848 की इसी क्रांति के चलते राजा को गद्दी छोड़नी पड़ी थी और एक गणतंत्र की घोषणा की गई जो सभी पुरुषों के सार्विक मताधिकार पर आधारित था।

(2) यूरोप के अन्य भागों में जहाँ अभी तक स्वतंत्र राष्ट्र राज्य अस्तित्व में नहीं आए थे- जैसे जर्मनी, इटली, पोलैंड, ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य – वहाँ के उदारवादी मध्यवर्गों के स्त्री-पुरुषों ने संविधानवाद की माँग को राष्ट्रीय एकीकरण की माँग से जोड़ दिया।

(3) उन्होंने बढ़ते जन असंतोष का फ़ायदा उठाया और एक राष्ट्र-राज्य के निर्माण की माँगों को आगे बढ़ाया।

(4) यह राष्ट्र-राज्य संविधान, प्रेस की स्वतंत्रता और संगठन बनाने की आज़ादी जैसे संसदीय सिद्धांतों पर आधारित था।

सामाजिक क्षेत्र में परिवर्तन

(1) उदारवादी आंदोलन के अंदर महिलाओं को भी राजनीतिक अधिकार प्रदान किए गए।

(2) महिलाओं ने अपने राजनीतिक संगठन स्थापित किए, अखबार शुरू किए और राजनीतिक बैठकों और प्रदर्शनों में शिरकत की।

आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन

(1) इस क्रांति के दौरान मजदूरों और गरीब लोगों को भी बहुत अच्छा खासा फायद पहुंचा।

(2) इसी क्रांति के दौरान व्यापार की उन्नति ने रफ्तार पकड़ी।

प्रश्न 2 – यूरोप में राष्ट्रवाद के विकास में संस्कृति के योगदान को दर्शाने के लिए तीन उदाहरण दें।

उत्तर :- संस्कृति ने कितने ही सालों से मानवों को एक दूसरे से बांधकर रखा हुआ है। यूरोप में राष्ट्रवाद के विकास में संस्कृति का बहुत बड़ा योगदान रहा है –

(1) फ्रेड्रिक सॉरयू का यूटोपिया – फ्रांस में जन्मा फ्रेड्रिक सॉरयू एक बहुत अच्छा कलाकार था। उसने 1848 में चार चित्रों की एक श्रृंखला बनाई थी। इस चित्र के लिए उसने बहुत मेहनत की। इस चित्र में उसने सपनों का एक संसार रचा जो उसके शब्दों में ‘जनतांत्रिक और सामाजिक गणतंत्रों से मिल कर बना था। सभी उम्र और सामाजिक वर्गों के स्त्री-पुरुष एक लंबी कतार में स्वतंत्रता की प्रतिमा की वंदना करते हुए जा रहे हैं। इस चित्र में औरत की एक प्रतिमा है जिसके एक हाथ में ज्ञानोदय की मशाल है तो दूसरे हाथ में मनुष्य के अधिकारों का घोषणापत्र। प्रतिमा के सामने जमीन पर निरंकुश संस्थानों के ध्वस्त अवशेष बिखरे हुए हैं। चित्र में लोगों की लंबी कतार में सबसे पहले अमेरिका और यूरोप के लोग खड़े हैं। तो दूसरी ओर स्वतंत्रता की मूर्ति से कहीं आगे इस जुलूस का नेतृत्व कर रहे हैं संयुक्त राज्य अमेरिका और स्विट्ज़रलैंड। उसके पीछे जर्मनी के लोग हैं जो काला, लाल और सुनहरा झंडा थामे हैं।

(2) कार्लकैस्पर फ्रिट्ज़ का स्वतंत्रता के वृक्ष का रोपण – इस चित्र में यह दिखाया गया है कि कैसे फ्रेंच सेना ज्वेब्रेकन राज्य पर आक्रमण कर रही है। फ्रांस के सैनिकों ने नीली, लाल और सफेद रंग की पोशाक पहनी हुई है। चित्र में वह फ्रांस के आम नागरिकों पर अत्याचार करते हुए दिखाई दे रहे है। सैनिकों के अत्याचार से परेशान लोग स्वतंत्रता के वृक्ष पर एक पट्टी लगा रहे हैं। उस पट्टी पर लिखा है – हमसे आजादी और समानता ले लो। यह मानवता का आदर्श रूप है।

यूजीन लाक़ोआ की ‘द मसैकर ऐट किऑस’- यूजीन लाक़ोआ का चित्र भी एक विशेष घटना का वर्णन करता है। इस चित्र में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि कैसे तुर्को ने यूनान के नागरिकों को प्रताड़ित किया था। इस चित्र को देखकर यह पता चलता है कि कैसे तुर्को ने 20,000 यूनानी लोगों को मौत के घाट उतार दिया था।

प्रश्न 3 – किन्हीं दो देशों पर ध्यान केंद्रित करके स्पष्ट करें कि उन्नीसवीं शताब्दी में राष्ट्रों का विकास कैसे हुआ।

उत्तर :- यहां पर हम दो देशों पर चर्चा करेंगे –

जर्मनी –

(1) साल 1848 के बाद से पूरे यूरोप में राष्ट्रवाद का जनतंत्र और क्रांति से अलगाव होने लगा था। जर्मनी के आम लोगों के दिल में राष्ट्रवाद का प्रेम फूट पड़ा था।

(2) जर्मन नागरिकों में संविधान, प्रेस की स्वतंत्रता और संगठन बनाने की आजादी को लेकर जबरदस्त लहर दौड़ पड़ी।

(3) 1848 में जर्मन महासंघ के विभिन्न इलाकों को जोड़ कर एक निर्वाचित संसद द्वारा शासित राष्ट्र-राज्य बनाने का प्रयास किया था। मगर राष्ट्र निर्माण की यह उदारवादी पहल राजशाही और फ़ौज की ताकत ने मिलकर दबा दी।

(4) लेकिन कुछ ही समय बाद प्रशा ने राष्ट्रीय एकीकरण के आंदोलन का नेतृत्व संभाल लिया। उसका प्रमुख मंत्री. ऑटो वॉन बिस्मार्क इस प्रक्रिया का जनक था। बिस्मार्क ने प्रशा की सेना और नौकरशाही की मदद ली।

(5) तकरीबन सात वर्ष तक बिस्मार्क की अगुवाई में प्रशा ने ऑस्ट्रिया, डेन्मार्क और फ्रांस से युद्ध लड़ा। सात साल की मेहनत के बाद आखिरकार प्रशा की जीत हुई और जर्मनी के एकीकरण का सपना पूरा हुआ।

इटली –

उन्नीसवीं सदी के मध्य में इटली सात राज्यों में बँटा हुआ था जिनमें से केवल एक सार्डिनिया पीडमॉण्ट में एक इतालवी राजघराने का शासन था। उत्तरी भाग ऑस्ट्रियाई हैब्सबर्गों के अधीन था, मध्य इलाकों पर पोप का शासन था और दक्षिणी क्षेत्र स्पेन के वर्षो राजाओं के अधीन थे। इतालवी भाषा ने भी साझा रूप हासिल नहीं किया था और अभी तक उसके विविध क्षेत्रीय और स्थानीय रूप मौजूद थे। फिर मेत्सिनी ने लिगुरिया में क्रांति छेड़कर पूरी दुनिया में सनसनी मचा दी थी। उस वक्त उसकी उम्र मात्र 24 साल की थी। यह क्रांति करने के लिए उसे अपने देश को छोड़ने का फरमान सुना दिया गया था। उसे यंग इटली और यंग यूरोप जैसे दो भूमिगत संगठनों की नींव रखने का श्रेय जाता है। यंग इटली की स्थापना मार्सेई में की गई थी। और यंग यूरोप की स्थापना बर्न में की गई थी।

मेत्सिनी के अलावा काउंट कैमिली दे कावूर ने चतुर कूटनीतिक संधि के तहत सार्डिनिया को जीत लिया था। उसने इटली के एकीकरण के सपने को पूरा किया था। उसने इटली के आम लोगों को एकीकरण के लिए जागरूक किया। उसने पीडमोंट में अनेकों आर्थिक सुधार किए। काउंट कैमिलो दे कावूर ने ज्यूसेपे गैरीबाल्डी के साथ राजनयिक गठबंधन करके ऑस्ट्रिया की सेना को बुरी तरह परास्त कर दिया।

प्रश्न 4 – ब्रिटेन में राष्ट्रवाद का इतिहास शेष यूरोप की तुलना में किस प्रकार भिन्न था?

उत्तर :- ब्रिटेन में राष्ट्रवाद का इतिहास शेष यूरोप की तुलना में इस प्रकार भिन्न था –

(1) ब्रिटेन में राष्ट्र राज्य का निर्माण अचानक हुई कोई उथल-पुथल या क्रांति का परिणाम नहीं था। यह एक लंबी चलने वाली प्रक्रिया का नतीजा था।

(2) अठारहवीं सदी के पहले ब्रितानी राष्ट्र था ही नहीं। ब्रितानी द्वीप समूह में रहने वाले लोगों-अंग्रेज, वेल्श, स्कॉट या आयरिश की मुख्य पहचान नृजातीय ( Ethnic) थी।

(3) इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के बीच ऐक्ट ऑफ यूनियन (1707) से ‘यूनाइटेड किंग्डम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन’ का गठन हुआ। इससे इंग्लैंड, व्यवहार में स्कॉटलैंड पर अपना प्रभुत्व जमा पाया।

(4) स्कॉटलैंड की खास संस्कृति और राजनीतिक संस्थानों को योजनाबद्ध तरीके से दबाया गया। स्कॉटिश हाइलैंड्स के लोगों को अपनी गेलिक भाषा बोलने या अपनी राष्ट्रीय पोशाक पहनने की मनाही थी। उनमें से बहुत सारे लोगों को अपना वतन छोड़ने पर मजबूर किया गया।

(5) वोल्फ़ टोन और उसकी यूनाइटेड आयरिशमेन (1798) की अगुवाई में हुए असफल विद्रोह के बाद 1801 में आयरलैंड को बलपूर्वक यूनाइटेड किंग्डम में शामिल कर लिया गया। एक नए ‘ब्रितानी राष्ट्र’ का निर्माण किया गया जिस पर हावी आंग्ल संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया गया।

(6) ब्रिटेन के प्रतीक चिह्नों, ब्रितानी झंडा (यूनियन जैक) और राष्ट्रीय गान (गॉड सेव अवर नोबल किंग) को खूब बढ़ावा दिया गया और पुराने राष्ट्र इस संघ में मातहत सहयोगी के रूप में ही रह पाए।

प्रश्न 5 – बालकन प्रदेशों में राष्ट्रवादी तनाव क्यों पनपा?

उत्तर :- 1871 के बाद यूरोप में गंभीर राष्ट्रवादी तनाव का स्रोत बाल्कन क्षेत्र था। इस क्षेत्र में भौगोलिक और जातीय भिन्नता थी। इसमें आधुनिक रोमानिया, बुल्गेरिया, अल्बेनिया यूनान मेसिडोनिया, क्रोएशिया, बोस्निया हर्जेगोविना, स्लोवेनिया सर्विया और मॉन्टिनिग्रो शामिल थे। क्षेत्र के निवासियों को आमतौर पर स्लाव पुकारा जाता था। बाल्कन क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा ऑटोमन साम्राज्य के नियंत्रण में था बाल्कन क्षेत्र में रूमानी राष्ट्रवाद के विचारों के फैलने और ऑटोमन साम्राज्य के विघटन से स्थिति काफी विस्फोटक हो गई। जैसे-जैसे विभिन्न स्लाव राष्ट्रीय समूहों ने अपनी पहचान और स्वतंत्रता की परिभाषा तय करने की कोशिश की, बाल्कन क्षेत्र गहरे टकराव का क्षेत्र बन गया। बाल्कन राज्य एक-दूसरे से भारी ईर्ष्या करते थे और हर एक राज्य अपने लिए ज्यादा से ज्यादा इलाका हथियाने की उम्मीद रखता था। परिस्थितियाँ और अधिक जटिल इसलिए हो गई क्योंकि बाल्कन क्षेत्र में बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा होने लगी।

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