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Class 12 Geography Book-1 Ch-8 “अंतर्राष्ट्रीय व्यापार” Notes In Hindi

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Mamta Kumari
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इस लेख में छात्रों को एनसीईआरटी 12वीं कक्षा की भूगोल की पुस्तक-1 यानी मानव भूगोल के मूल सिद्धांत के अध्याय- 8 “अंतर्राष्ट्रीय व्यापार” के नोट्स दिए गए हैं। विद्यार्थी इन नोट्स के आधार पर अपनी परीक्षा की तैयारी को सुदृढ़ रूप प्रदान कर सकेंगे। छात्रों के लिए नोट्स बनाना सरल काम नहीं है, इसलिए विद्यार्थियों का काम थोड़ा सरल करने के लिए हमने इस अध्याय के क्रमानुसार नोट्स तैयार कर दिए हैं। छात्र अध्याय- 8 भूगोल के नोट्स यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

Class 12 Geography Book-1 Chapter-8 Notes In Hindi

आप ऑनलाइन और ऑफलाइन दो ही तरह से ये नोट्स फ्री में पढ़ सकते हैं। ऑनलाइन पढ़ने के लिए इस पेज पर बने रहें और ऑफलाइन पढ़ने के लिए पीडीएफ डाउनलोड करें। एक लिंक पर क्लिक कर आसानी से नोट्स की पीडीएफ डाउनलोड कर सकते हैं। परीक्षा की तैयारी के लिए ये नोट्स बेहद लाभकारी हैं। छात्र अब कम समय में अधिक तैयारी कर परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त कर सकते हैं। जैसे ही आप नीचे दिए हुए लिंक पर क्लिक करेंगे, यह अध्याय पीडीएफ के तौर पर भी डाउनलोड हो जाएगा।

अध्याय- 8 “अंतर्राष्ट्रीय व्यापार“

बोर्डसीबीएसई (CBSE)
पुस्तक स्रोतएनसीईआरटी (NCERT)
कक्षाबारहवीं (12वीं)
विषयभूगोल
पाठ्यपुस्तकमानव भूगोल के मूल सिद्धांत
अध्याय नंबरआठ (8)
अध्याय का नाम“अंतर्राष्ट्रीय व्यापार”
केटेगरीनोट्स
भाषाहिंदी
माध्यम व प्रारूपऑनलाइन (लेख)
ऑफलाइन (पीडीएफ)
कक्षा- 12वीं
विषय- भूगोल
पुस्तक- मानव भूगोल के मूल सिद्धांत
अध्याय- 8 “अंतर्राष्ट्रीय व्यापार”

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और उसका इतिहास

  • व्यापार को तृतीय क्रियाकलाप के रूप में जाना जाता है।
  • व्यापार राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दो तरीके से किया जाता है।
  • कुछ देशों के बीच उनकी भौगोलिक सीमा के बाहर होने वाले वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात-निर्यात को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कहते हैं।
  • इस व्यापार के माध्यम से ज्यादातर देश उन वस्तुओं तक अपनी पहुँच बनाने के लिए व्यापार करते हैं जिनका उत्पादन वे स्वयं नहीं कर सकते।
  • पुराने समय में वस्तुओं का व्यापार सिर्फ स्थानीय बाजारों तक ही सीमित था।
  • पहले गरीब लोग अपने संसाधनों का आधिकांश भाग सिर्फ भोजन और वस्त्र जैसी मूलभूत आवश्यकताओं पर ही खर्च करते थे वहीं धनी लोग कीमती आभूषण या महँगे कपड़ों पर खर्च करते थे।
  • रोमन साम्राज्य के विखंडन के बाद (12वीं और 13वीं शताब्दी में) यूरोपीय वाणिज्य में वृद्धि हुई थी।
  • आरंभिक दिनों में रेशम मार्ग लंबी दूरी वाला व्यापार था जोकि 6000 की.मी. लंबा था।
  • 15वीं सदी में यूरोपीय उपनिवेशवाद के विकास के साथ ‘दास व्यापार’ उदय हुआ।
  • दास व्यापार दो सौ साल तक अस्तित्व में रहा। उसके बाद इसकी समाप्ति 1792 ई. में डेनमार्क में, 1807 ई. में ग्रेट ब्रिटेन में और 1808 ई. में अमेरिका में हो गई।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के मुख्य आधार

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के मुख्य आधार निम्न हैं-

राष्ट्रीय संसाधन व उनमें भिन्नता

  • मृदा, उच्चावच और जलवायु भिन्नता के कारण विश्व के राष्ट्रीय संसाधन असमान रूप से विपरीत हैं।
  • भौगोलिक संरचना खनिज संसाधनों के आधार को निर्धारित करती है।
  • खनिज संसाधनों की अधिक उपलब्धता औद्योगिक विकास को आधार प्रदान करती है।
  • जलवायु किसी क्षेत्र में रहने वाले वन्य जीव और वनस्पति के प्रकार को प्रभारित करती है।

जनसंख्या कारक

  • जनसंख्या के रूप में प्रत्येक देश की कला व संस्कृति भी व्यापार को प्रभावित करती है। हस्तशिल्प सांस्कृतिक कारक का मुख्य हिस्सा है। इसके कारण ही किसी देश में किसी विशेष देश की वस्तुओं की माँग बढ़ती है।
  • कम संख्या वाले देशों में आंतरिक व्यापार अधिक लेकिन बाहरी देशों के साथ व्यापार कम होता है क्योंकि ऐसे देशों में खेती और उद्योगों से प्राप्त उत्पादों का ज्यादातर भाग स्थानीय बजारों में ही खप जाता है।

आर्थिक विकास की स्थिति

  • किसी भी देश का आर्थिक विकास सीधे उस देश के व्यापार पर निर्भर करता है।
  • कृषि विशेष क्षेत्रों में कृषि उत्पादों का विनिमय किया जाता है।
  • उद्योग प्रधान देशों में नई-नई तकनीकों और उत्पादित वस्तुओं का निर्यात करते हैं।
  • इस तरह आर्थिक विकास की स्थिति भी राष्ट्र के व्यापार को प्रभावित करती है।

विदेशी निवेश की सीमा

  • अधिकतर विकासशील देशों में पूँजी की कमी होती है, जिसके कारण ये देश विदेशी निवेश पर निर्भर रहते हैं क्योंकि विदेशी निवेश विकासशील देशों में व्यापार को बढ़ाता है।
  • कृषि प्रधान व विकासशील देशों में बागवानी कृषि के विकास के लिए पूँजी के रूप में खनन, अभियांत्रिकी, काठ कबाड़ आदि की आवश्यकता होती है।
  • विकासशील देशों में पूँजी निवेश करके विकसित देश खाद्य पदार्थों और खनिजों का आयात सुनिश्चित करते हैं।
  • विकसित देश अपनी निर्मित वस्तुओं के लिए विकासशील देशों में बाजार भी स्थापित करते हैं।

परिवहन

  • आरंभिक काल में परिवहन की सुविधा न होने के कारण व्यापार स्थानीय इलाकों तक ही सीमित था।
  • प्राचीन कल में कुछ विशेष वस्तुओं जैसे रेशम, रत्न और मसालों का व्यापार लंबी दूरी तक किया जाता था।
  • रेल, समुद्री एवं वायु परिवहन के अलावा वस्तुओं को ज्यादा दिन तक सुरक्षित रखने वाले प्रशीतन तथा परिरक्षण के साधनों ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा दिया।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के तीन महत्वपूर्ण पक्ष

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के तीन महत्वपूर्ण पक्ष निम्नलिखित हैं-

  • परिमाण: सभी व्यापारिक सेवाओं को छोड़कर व्यापार की गई वस्तुओं की कुल तौल को परिमाण कहा जाता है और सेवाओं के कुल मूल्य को व्यापार का परिमाण कहा जाता है।
  • संयोजन: संयोजन का संबंध किसी देश द्वारा आयातित और निर्यातित वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रकार में हुए परिवर्तन से है। वैश्विक स्तर पर होने वाले व्यापार में महाद्वीपों की हिस्सेदारी में परिवर्तन हुआ है जिसका कारण है व्यापार में यूरोप का योगदान कम होना और एशिया का योगदान बढ़ना।
  • दिशा: विकासशील देश पहले मूल्यवान और हाथ से बनी स्वतुएँ मुख्य रूप से यूरोपीय देशों को निर्यात करते थे। फिर 19वीं शताब्दी में व्यापार की दिशा में परिवर्तन आया, जिसके कारण यूरोपीय देशों ने अपने उपनिवेशों से खाद्य पदार्थ एवं कच्चे माल का निर्यात करना शुरू कर दिया। उसके बाद 20वीं शताब्दी के बाद विकसित और विकासशील देशों की प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई जिससे व्यापारिक वस्तुओं की प्रकृति भी बदल गई।

व्यापार संतुलन का अर्थ

  • किसी समय अंतराल में विभिन्न देशों द्वारा किए गए आयात-निर्यात के अंतर को व्यापार संतुलन कहते हैं।
  • व्यापार संतुलन बाकी देशों को आयात-निर्यात की गई स्वतुओं की मात्रा का लेखा-जोखा दर्शाता है।
  • इसे प्रमुख दो भागों में बाँटा गया है-
    • ऋणात्मक व्यापार संतुलन: जब किसी देश का आयात मूल्य देश के निर्यात मूल्य की तुलना में अधिक होता है, तो तब देश का व्यापार संतुलन ऋणात्मक होता है।
    • धनात्मक व्यापार संतुलन: जब किसी देश का निर्यात मूल्य देश के आयात मूल्य की तुलना में अधिक होता है, तो तब देश का व्यापार संतुलन धनात्मक होता है।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रमुख दो वर्ग

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रमुख दो प्रकारों का वर्णन निम्नलिखित है-

  • द्विपार्श्विक व्यापार: द्विपार्श्विक व्यापार या द्विपक्षीय व्यापार उसे कहते हैं जब व्यापार दो देशों के मध्य होता है। इसके अंतर्गत दो देश आपसी समझौते से विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं का आयात-निर्यात करते हैं।
  • बहुपार्श्विक व्यापार: इसके अंतर्गत व्यापार बहुत से व्यापारिक देशों के साथ किया जाता है। कुछ देश आपसी साझेदारी के आधार पर किसी एक देश को ‘सर्वाधिक अनुकूल राष्ट्र’ (MNF) का दर्जा दे सकते हैं। यह दर्जा मिलने के बाद वह देश अनेक देशों के साथ व्यापार कर सकता है।

मुक्त व्यापार/उदारीकरण की अवस्था

  • व्यापार हेतु अर्थव्यवस्था को खोलना व्यापार उदारीकरण या मुक्त व्यापार की व्यवस्था कहलाता है।
  • मुक्त व्यापार सीमा शुल्क को हटाकर किया जाता है। इस अवरोध के हटने से व्यापार को फलने-फूलने का अवसर मिलता है।
  • व्यापार उदारीकरण घरेलू उत्पादों व सेवाओं से प्रतिस्पर्धा करने के लिए अनुमति प्रदान करता है।
  • मुक्त व्यापार और भूमंडलीकरण विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं।
  • इस व्यापार के अंतर्गत संपन्न देशों के समान विकासशील देशों को अवसर नहीं मिलता है।

एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन के रूप में ‘विश्व व्यापार संगठन’

  • कुछ देशों ने वर्ष 1948 में विश्व को उच्च सीमा शुल्क और विभिन्न प्रकार की अन्य बाधाओं से मुक्त कराने के लिए ‘एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ’ (GATT) का गठन किया था।
  • वर्ष 1994 में एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ संगठन के सदस्यों ने मुक्त और निष्पक्ष व्यापार की दृष्टि से एक स्थायी संगठन की माँग की थी।
  • सदस्यों की माँग के बाद वर्ष 1995 एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ (GATT) नाम को विश्व व्यापार संगठन (WTO) के रूप में परिवर्तित कर दिया।
  • विश्व व्यापार संगठन (WTO) का मुख्यालय जनेवा (स्विट्जरलैंड) में है जिसका संस्थापक सदस्य भारत भी है।
  • विश्व व्यापार संगठन एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन के रूप में सभी सदस्य देशों के व्यवसाय संबंधित विवादों का हल वैश्विक नियम के आधार पर करता है।
  • यह दूरसंचार, बैंकिंग जैसी सेवाओं के साथ-साथ बौद्धिक संपदा अधिकार के व्यापार को भी अपने कार्यों में शामिल करता है।
  • वर्ष 2016 में विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों की संख्या 164 थी।
  • इस संगठन की आलोचना उन लोगों द्वारा की जाती है जो मुक्त व्यापार और अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण के प्रभावों से परेशान है।
  • कुछ आलोचकों का यह भी कहना है कि विश्व व्यापार संगठन अमीर-गरीब के बीच की खाई को दिन प्रति दिन बढ़ा रहा है।

पत्तन से अभिप्राय

  • अंतर्राष्ट्रीय दुनिया के प्रवेश द्वार को पत्तन कहा जाता है।
  • पत्तनों के द्वारा जहाजी माल और यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता है।
  • पत्तन अनेक तरह की सुविधाएँ प्रदान करते हैं जैसे- जहाजी माल को लदाना व उतारना और वस्तुओं को सुरक्षित रखने की सुविधा उपलब्ध कराना इत्यादि।
  • एक पत्तन द्वारा निपटाया नौभार, उसके पृष्ठ प्रदेश के विकास के स्तर का सूचक है।

पत्तन के विभाग

पत्तनों को विभिन्न आधारों पर निम्नलिखित विभागों में बाँटा गया है-

निपटाए गए नौभार के मुताबिक पत्तनों के प्रकार

निपटाए गए नौभार के मुताबिक पत्तनों के प्रकारों का वर्णन इस प्रकार है-

  • औद्योगिक पत्तन: ये पत्तन विशेष रूप से थोक नौभार के लिए बने होते हैं। इनके माध्यम से चीनी, अनाज, अयस्क, तेल और रसायन जैसे पदार्थों का व्यापार किया जाता है।
  • वाणिज्यिक पत्तन: इन पत्तनों के द्वारा साधारण नौभार एवं विनिर्मित वस्तुओं का व्यापार (आयात-निर्यात) किया जाता है। इन पत्तनों पर यात्रियों के लिए यातायात की भी सुविधा होती है।
  • विस्तृत पत्तन: विश्व के सभी बड़े-बड़े पत्तनों को इसी वर्ग में शामिल किया जाता है। ये पत्तन अधिक मात्रा में नौभार का थोक में प्रबंध करते हैं।

अवस्थिति के मुताबिक पत्तनों के प्रकार

अवस्थिति के मुताबिक पत्तनों के प्रकारों का वर्णन इस प्रकार है-

  • अंतर्देशीय पत्तन: अंतर्देशीय पत्तन समुद्री तटों से दूर होते हैं। ये किसी नगर अथवा नदी द्वारा समुद्र से जुड़े होते हैं।
  • बाह्य पत्तन: ये पत्तन वास्तविक पत्तन से दूर बने होते हैं जोकि गहरे जल के पत्तन होते हैं। एवनमाउथ और पिरेइअस पत्तन ऐसे पत्तनों के प्रमुख उदाहरण हैं।

विशिष्टीकृत कार्यकलापों के आधार पर पत्तनों के प्रकार

विशिष्टीकृत कार्यकलापों के आधार पर पत्तनों के प्रकारों का वर्णन इस प्रकार है-

  • तेल पत्तन: ये पत्तन मुख्य रूप से तेल के प्रक्रमण और नौ-परिवहन का कार्य करते हैं इसलिए ऐसे कुछ पत्तनों को टैंकर पत्तन और कुछ को तेलशोधन पत्तन कहा जाता है। उदाहरण के लिए लेबनान में त्रिपोली टैंकर पत्तन है वहीं फारस की खाड़ी में स्थित अबदान तेलशोधन पत्तन है।
  • मार्ग पत्तन: ये पत्तन महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर विश्राम केंद्र के रूप में विकसित हुए थे लेकिन बाद में ये पत्तन वाणिज्यिक पत्तनों के रूप में विकसित हो गए। उदाहरण के लिए अदन और सिंगापुर इसी श्रेणी के पत्तन हैं।
  • पैकेट स्टेशन: इन पत्तनों को फेरी-पत्तन के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इन पत्तनों का प्रयोग छोटी-छोटी दूरियों को तय करने जलीय क्षेत्रों में डाक पहुँचाने तथा यात्रियों के परिवहन के लिए किया जाता है।
  • आंत्रपो पत्तन: इन पत्तनों को एकत्रण केंद्र कहा जाता है, जहाँ विभिन्न देशों से निर्यात के लिए वस्तुएँ लाई जाती हैं। उदाहरण के लिए सिंगापुर को एशिया के लिए आंत्रपो पत्तन माना जाता है।
  • नौ-सेना पत्तन: ये पत्तन सिर्फ सामाजिक महत्व वाले पत्तन होते हैं। ऐसे पत्तनों का कार्य युद्धक जहाजों को सेवाएँ देना और उनके लिए मरम्मत कार्यशलाएँ उपलब्ध कराना है।
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